स्विट्ज़रलैंड के दावोस में आयोजित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) की इस साल की पांच दिवसीय वार्षिक बैठक ने वैश्विक राजनीति और शक्ति संतुलन में हो रहे गहरे बदलावों को खुलकर सामने ला दिया। 19 जनवरी से 23 जनवरी तक चली इस बैठक में दिए गए भाषणों, कूटनीतिक संकेतों और नई पहलों ने यह साफ कर दिया कि अमेरिका के नेतृत्व वाला पुराना वर्ल्ड ऑर्डर अब पहले जैसा नहीं रहा। कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के एक बयान ने इस बदलाव को शब्द दे दिए “अमेरिका के नेतृत्व वाला वर्ल्ड ऑर्डर अब वापस नहीं लौटेगा।”
मार्क कार्नी का यह बयान केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं था, बल्कि पश्चिमी दुनिया के भीतर बढ़ती बेचैनी और अविश्वास का सार्वजनिक स्वीकार था। यही वजह है कि उनका भाषण रातों-रात वायरल हो गया और इसे हाल के वर्षों के सबसे ईमानदार वैश्विक भाषणों में गिना जाने लगा। दावोस के मंच से उठी यह आवाज़ उस अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है, जो दशकों से अमेरिका के इर्द-गिर्द घूमती रही।
दावोस में ट्रंप के 24 घंटे और बढ़ता असमंजस
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस बार दावोस में करीब 24 घंटे मौजूद रहे, लेकिन इतने कम समय में ही उन्होंने यह दिखा दिया कि उन्हें “मास्टर ऑफ केयोस” क्यों कहा जाता है। छह साल बाद अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में दावोस लौटे ट्रंप ने वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की आधिकारिक थीम “द स्पिरिट ऑफ डायलॉग” को लगभग नजरअंदाज करते हुए मंच को पूरी तरह ‘ट्रंप शो’ में बदल दिया।
अपने दूसरे कार्यकाल की उपलब्धियों का बखान, वैश्विक नेताओं के बीच नई पहल की घोषणाएं और सहयोगियों पर तीखे हमले ट्रंप हर मोर्चे पर आक्रामक दिखे। एक ओर वे ग्रीनलैंड को लेकर सैन्य कार्रवाई से इनकार करते हुए समझौते की बात कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर नाटो और यूरोपीय देशों की खुलकर आलोचना कर रहे थे। 79 वर्षीय ट्रंप के इन विरोधाभासी बयानों ने दुनिया को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि अमेरिका की दिशा आखिर है क्या।
ग्रीनलैंड पर फिर दोहराया दावा
दावोस में ट्रंप ने एक बार फिर ग्रीनलैंड को हासिल करने की अपनी इच्छा दोहराई। हालांकि उन्होंने साफ किया कि अमेरिका इसके लिए सैन्य ताकत का इस्तेमाल नहीं करेगा। उन्होंने डेनमार्क को “अहसान फरामोश” बताते हुए दावा किया कि ग्रीनलैंड की सुरक्षा अमेरिका के बिना संभव नहीं है। बाद में ट्रंप ने मीडिया को बताया कि इस मुद्दे पर नाटो महासचिव मार्क रुटे से बातचीत हुई है और भविष्य के किसी समझौते की रूपरेखा पर सहमति बनी है। लेकिन डेनमार्क और ग्रीनलैंड के नेताओं ने इस पर नाराज़गी जताते हुए सवाल उठाया कि उनकी संप्रभुता पर नाटो महासचिव किस हैसियत से बात कर रहे हैं।
‘बोर्ड ऑफ पीस’ और सहयोगियों की दूरी
ट्रंप ने दावोस में ‘बोर्ड ऑफ पीस’ नाम से एक नई वैश्विक पहल की घोषणा की, जिसका उद्देश्य दुनिया भर के संघर्षों को सुलझाना बताया गया। उन्होंने कहा कि इसका प्राथमिक लक्ष्य गाजा में युद्धविराम को मजबूत करना और वैश्विक तनाव कम करना है। इस पहल में पाकिस्तान समेत करीब 20 देशों के शामिल होने की बात कही गई, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि अमेरिका के किसी भी प्रमुख यूरोपीय सहयोगी ने इसमें रुचि नहीं दिखाई।
ब्रिटेन, फ्रांस, नॉर्वे और स्वीडन जैसे देशों ने अलग-अलग कारणों से इससे दूरी बनाई। कनाडा, भारत, चीन, रूस, यूक्रेन और यूरोपीय संघ की कार्यकारी शाखा ने भी इस पर कोई स्पष्ट समर्थन नहीं दिया। विश्लेषकों का मानना है कि ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में वही देश आगे आए हैं जो ट्रंप के कट्टर समर्थक माने जाते हैं।
नाटो और यूरोप पर खुला हमला
ट्रंप ने दावोस में नाटो देशों पर तीखा हमला करते हुए कहा कि यूरोपीय सहयोगी अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर हैं। उन्होंने यूरोप की ऊर्जा नीतियों को भी गलत बताते हुए कहा कि महाद्वीप गलत दिशा में आगे बढ़ रहा है। इन बयानों ने यह संकेत दिया कि अमेरिका अब अपने पारंपरिक सहयोगियों के साथ भी पहले जैसा भरोसे का रिश्ता नहीं रखता।
रूस-यूक्रेन युद्ध पर नई हलचल
दावोस के इतर ट्रंप ने यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर जेलेंस्की से बंद कमरे में बातचीत की। इस चर्चा के बाद युद्धविराम को लेकर सकारात्मक संकेत मिले हैं। फरवरी 2022 में युद्ध शुरू होने के बाद पहली बार रूस, यूक्रेन और अमेरिका के बीच त्रिपक्षीय बातचीत की संभावना जताई जा रही है, जिसके लिए वार्ताकार अबू धाबी जाने वाले हैं।
मार्क कार्नी का भाषण और ‘नया वर्ल्ड ऑर्डर’
दावोस की सबसे बड़ी चर्चा कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के भाषण को लेकर रही। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि अमेरिका के नेतृत्व वाली नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अब टूट रही है और इसे पुरानी यादों के सहारे नहीं बचाया जा सकता। उन्होंने कहा कि दुनिया किसी संक्रमण से नहीं, बल्कि एक बड़े विध्वंस से गुजर रही है।
कार्नी ने मध्यम शक्ति वाले देशों से आह्वान किया कि वे मिलकर एक “तीसरा रास्ता” अपनाएं—जो न तो किसी महाशक्ति की अंधी अनुकरण पर आधारित हो और न ही टकराव पर। उनका संदेश साफ था: अगर आप फैसले की मेज पर नहीं हैं, तो आप मेन्यू का हिस्सा बन जाते हैं।
जेलेंस्की की यूरोप पर नाराज़गी
यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने भी दावोस में यूरोपीय देशों पर खुलकर नाराज़गी जताई। उन्होंने कहा कि अमेरिकी दबाव के बीच यूक्रेन को रूस के भरोसे छोड़ दिया गया है। जेलेंस्की ने कहा कि यूरोप खोया-सा दिख रहा है और उसे अपनी रक्षा और भूमिका को लेकर गंभीर होना होगा।
दावोस से क्या साफ हुआ?
दावोस के पांच दिनों ने यह संकेत दे दिया कि अमेरिका अब दुनिया का ‘बिग ब्रदर’ नहीं रहा। वह अब एक ऐसा सदस्य बनता जा रहा है जो अपने हितों के अनुसार फैसले करता है, चाहे इससे पुराने रिश्ते कमजोर क्यों न पड़ जाएं। यूरोप पहले से ज्यादा असहाय नजर आ रहा है, जबकि रूस और चीन इस उथल-पुथल को दूर से देख रहे हैं। साफ है पुराना वर्ल्ड ऑर्डर टूट रहा है और नया अभी आकार ले रहा है।