बांग्लादेश में हत्या, राजनीति और चुनाव को लेकर तनाव और गहराता जा रहा है। चर्चित छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की हत्या के बाद उनके भाई उमर हादी ने देश की अंतरिम सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उमर हादी का कहना है कि उनके भाई की हत्या सत्ता में बैठे एक गुट की साजिश थी, जिसका मकसद आगामी राष्ट्रीय चुनाव को बाधित करना है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि दोषियों को जल्द सजा नहीं दी गई, तो मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार का भी वही हश्र हो सकता है, जो पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना का हुआ था।
शरीफ उस्मान हादी, जो ‘इंकलाब मंचो’ के संयोजक और बांग्लादेश के प्रमुख छात्र नेताओं में से एक थे, 2024 में हुए छात्र आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल रहे थे। इसी आंदोलन के दबाव में अगस्त 2024 में शेख हसीना को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था और उन्हें देश छोड़कर भारत में शरण लेनी पड़ी थी। हादी आगामी 12 फरवरी को होने वाले आम चुनाव में उम्मीदवार भी थे।
हादी की हत्या ढाका में उस समय हुई, जब वह एक मस्जिद से निकल रहे थे। गोली लगने के बाद उन्हें इलाज के लिए सिंगापुर ले जाया गया, जहां कुछ दिनों बाद उनकी मौत हो गई। उनकी मृत्यु की खबर सामने आते ही पूरे बांग्लादेश में आक्रोश फैल गया और राजधानी ढाका सहित कई इलाकों में प्रदर्शन शुरू हो गए।
मंगलवार को ढाका के शाहबाग स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय के सामने ‘शहीदी शपथ’ कार्यक्रम में बोलते हुए उमर हादी ने सीधे तौर पर अंतरिम सरकार को कठघरे में खड़ा किया। बांग्लादेशी अखबार द डेली स्टार के अनुसार, उमर हादी ने कहा कि यह सरकार के भीतर मौजूद एक गुट की साजिश है, जिसने जानबूझकर उनके भाई को निशाना बनाया ताकि चुनावी माहौल बिगाड़ा जा सके। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार अब इस हत्या को मुद्दा बनाकर चुनाव प्रक्रिया को पटरी से उतारने की कोशिश कर रही है।
उमर हादी ने अंतरिम सरकार को सख्त चेतावनी देते हुए कहा कि यदि उनके भाई के हत्यारों पर जल्द कार्रवाई नहीं हुई, तो मौजूदा सत्ता को भी एक दिन देश छोड़ने पर मजबूर होना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि सरकार अब तक जांच में कोई ठोस प्रगति दिखाने में नाकाम रही है, जिससे जनता का भरोसा तेजी से टूट रहा है।
हादी के भाई ने यह भी दावा किया कि शरीफ उस्मान हादी किसी भी एजेंसी, ताकतवर समूह या “विदेशी आकाओं” के दबाव में नहीं झुके थे और यही उनकी हत्या की सबसे बड़ी वजह बनी। उनके मुताबिक, हादी एक स्वतंत्र और निडर नेता थे, जो छात्र राजनीति और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में किसी भी तरह के हस्तक्षेप के खिलाफ खुलकर आवाज उठाते थे।
शरीफ उस्मान हादी की मौत के बाद हालात तेजी से बिगड़े। 18 दिसंबर को उनकी मृत्यु की पुष्टि होते ही सैकड़ों लोग सड़कों पर उतर आए। कई जगह हिंसक प्रदर्शन हुए, सरकारी और निजी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया गया और कुछ मीडिया संस्थानों के दफ्तरों में भी तोड़फोड़ की गई। हालात को काबू में लाने के लिए सुरक्षा बलों को तैनात करना पड़ा।
इसी उग्र माहौल के बीच एक और दर्दनाक घटना सामने आई, जिसने देश को और झकझोर दिया। ढाका-मयमनसिंह राजमार्ग के पास एक इलाके में भीड़ द्वारा एक हिंदू मजदूर, दीपू चंद्र दास, की हत्या कर दी गई। यह घटना 18 दिसंबर की रात हुई और इसके बाद देश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर भी गंभीर सवाल उठने लगे।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि शरीफ उस्मान हादी की हत्या ने बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। एक ओर चुनाव की तैयारी है, तो दूसरी ओर कानून-व्यवस्था और भरोसे का संकट गहराता जा रहा है। यदि सरकार जल्द और पारदर्शी तरीके से जांच पूरी कर दोषियों को सजा दिलाने में विफल रहती है, तो हालात और बिगड़ सकते हैं।
बांग्लादेश एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां एक हत्या ने न सिर्फ राजनीतिक अस्थिरता को बढ़ाया है, बल्कि देश के लोकतांत्रिक भविष्य और सामाजिक सौहार्द पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।