पहलगाम हमले के शहीद की पत्नी ऐशन्या द्विवेदी का गुस्सा फूटा, बोलीं – पाकिस्तान से मैच पीड़ितों का अपमान

मैच नहीं, मातम है ये – शहीद की पत्नी ने Ind vs Pak मुकाबले का किया विरोध

Vin News Network
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शहादत के तीन महीने बाद पाकिस्तान से क्रिकेट? – ऐशन्या द्विवेदी का सवाल BCCI से
Highlights
  • Asia Cup 2025 में भारत-पाकिस्तान मैच को लेकर विवाद
  • शहीद शुभम द्विवेदी की पत्नी ऐशन्या द्विवेदी ने उठाए सवाल
  • बीसीसीआई की सहमति को बताया भावनाओं से खिलवाड़

एशिया कप 2025 (Asia Cup 2025) को लेकर भारत-पाकिस्तान (Ind vs Pak) मैच की घोषणा के बाद विवाद खड़ा हो गया है। बीसीसीआई (BCCI) की इस सहमति पर पहल्गाम आतंकी हमले में शहीद हुए शुभम द्विवेदी की पत्नी ऐशन्या द्विवेदी ने गहरी नाराज़गी जताई है। उन्होंने कहा कि हमला हुए अभी तीन महीने भी नहीं बीते हैं, और भारत-पाक मैच को मंज़ूरी देना शहीदों की कुर्बानी का अपमान है।

क्या है मामला?
Asia Cup 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच होने वाले हाई-वोल्टेज मुकाबले को लेकर क्रिकेट प्रेमियों में उत्साह है, लेकिन इस बीच एक शहीद की पत्नी ने इस फैसले पर गहरी आपत्ति जताई है। ऐशन्या द्विवेदी, जिनके पति शुभम द्विवेदी की मौत अप्रैल 2025 में हुए पहल्गाम आतंकी हमले में हुई थी, ने BCCI के इस निर्णय पर तीखा विरोध जताया।

शहीद की पत्नी का बयान
“तीन महीने पहले मेरा सब कुछ मुझसे छीन लिया गया। पाकिस्तान समर्थित आतंकियों ने मेरे पति की जान ले ली। आज वही पाकिस्तान से हम क्रिकेट खेलते दिख रहे हैं। यह निर्णय सिर्फ मेरे नहीं, बल्कि हर पीड़ित परिवार की भावनाओं के साथ क्रूर मज़ाक है।” — ऐशन्या द्विवेदी, शहीद शुभम द्विवेदी की पत्नी

भावनाओं से खिलवाड़ या खेल का हिस्सा?
BCCI की ओर से अभी तक इस मुद्दे पर कोई औपचारिक बयान नहीं आया है। लेकिन यह तय है कि यह मामला सिर्फ एक मैच तक सीमित नहीं रह गया है। यह उन परिवारों की भावनाओं का सवाल है, जिन्होंने अपने सबसे प्रियजन को देश के लिए खोया है।

बहिष्कार की अपील
ऐशन्या ने मांग की है कि भारत को इस मैच का बहिष्कार करना चाहिए और पाकिस्तान के खिलाफ किसी भी खेल प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं लेना चाहिए जब तक वह आतंकवाद को समर्थन देना बंद न करे। उन्होंने अन्य शहीद परिवारों और आम जनता से भी इस फैसले के खिलाफ आवाज़ उठाने की अपील की।

राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया की उम्मीद
इस मामले पर जल्द ही राजनीतिक हलकों और सामाजिक संगठनों की प्रतिक्रिया आने की संभावना है। अक्सर ऐसे संवेदनशील मुद्दे राष्ट्रीय बहस का विषय बन जाते हैं और सरकारों को भी हस्तक्षेप करना पड़ता है।

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