उत्तराखंड में हर्षिल घाटी की आपदा ने एक बार फिर मानवता और प्राकृतिक आपदाओं के बीच संघर्ष को उजागर कर दिया है। उत्तरकाशी जिले के नौगांव ब्लॉक के बगासु गांव का रहने वाला युवक अजीत कुमार इस प्राकृतिक आपदा के बाद से लापता है। उसका अपने घरवालों से आखिरी संपर्क मंगलवार की शाम को हुआ था, जब उसने एक खौफनाक सूचना दी थी—”यहां बादल फट गया है, हम सामान पैक कर रहे हैं।” यह शब्द उसकी आखिरी आवाज़ बन गए, क्योंकि उसी पल उसका मोबाइल नेटवर्क कट गया और तब से अब तक उसका कोई सुराग नहीं मिल पाया है।
परिवार की उम्मीदें टूटी नहीं, लेकिन समय बीत रहा है
अजीत के भाई ममीत कुमार ने बताया कि मंगलवार की शाम 4 बजकर 10 मिनट पर अजीत से आखिरी बार बात हुई थी। अजीत ने बताया कि इलाके में बादल फट गया है और वह और उसके साथी जल्दबाज़ी में सामान समेट रहे हैं ताकि समय रहते वहां से निकला जा सके। लेकिन इसके बाद अचानक फोन कट गया और फिर कोई संपर्क नहीं हो पाया। अब 72 घंटे से भी ज़्यादा वक्त बीत चुका है, लेकिन अजीत का कुछ अता-पता नहीं है।
घटनास्थल पर भारी तबाही, राहत कार्य तेज
राज्य आपदा प्रबंधन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, हर्षिल घाटी में मंगलवार को दोपहर बाद तेज बारिश और अचानक बादल फटने की घटना सामने आई। इसके चलते नदी-नालों में उफान आ गया और कई अस्थायी शिविर, दुकानें और यात्री रूट बह गए। स्थानीय प्रशासन, राज्य आपदा मोचन बल (SDRF) और NDRF की टीमें मौके पर पहुंची हैं और लापता लोगों की तलाश में जुटी हैं। लेकिन लगातार हो रही बारिश, कीचड़ और मलबा राहत कार्यों में बाधा बन रहे हैं।
“हमारा बेटा कहां है?”—माँ की चीखें, बगासु गांव में मातम
बगासु गांव में अजीत कुमार के घर का माहौल बेहद ग़मगीन है। अजीत की मां फूट-फूट कर रो रही हैं और बार-बार यही पूछती हैं, “मेरा बेटा कहां है?” उनके आंसू सूखने का नाम नहीं ले रहे। गांव वाले उन्हें ढांढस बंधा रहे हैं, लेकिन उनका दिल सिर्फ अपने बेटे की सलामती की खबर सुनना चाहता है। परिवार की मांग है कि सरकार और प्रशासन हवाई तलाशी अभियान तेज़ करें और GPS डेटा, मोबाइल ट्रेसिंग जैसी तकनीकों का उपयोग करें ताकि अजीत और अन्य लापता लोगों का जल्द से जल्द पता लगाया जा सके।
अजीत की लोकेशन: राहत कार्यों के लिए अहम सुराग
अजीत जहां फंसा था, वह क्षेत्र हर्षिल घाटी के उपरी हिस्से में आता है, जो कि आमतौर पर ट्रैकिंग रूट्स और मजदूर कैंपों के लिए जाना जाता है। अजीत किसी निर्माण कार्य से जुड़े अस्थायी कैंप में कार्यरत था। यही वजह है कि वो इस आपदा में घिर गया। परिजनों ने प्रशासन से मांग की है कि ड्रोन सर्विलांस, सेटेलाइट इमेजरी और स्थानीय गाइड्स की मदद से उस क्षेत्र में व्यापक सर्च ऑपरेशन चलाया जाए।
स्थानीय विधायक और जिलाधिकारी ने दिया भरोसा
घटना की गंभीरता को देखते हुए स्थानीय विधायक और उत्तरकाशी के जिलाधिकारी ने परिवार से बात की है। उन्होंने आश्वासन दिया है कि राहत और बचाव कार्य तेज़ी से चल रहा है और अजीत को ढूंढ निकालने के लिए हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं।
पर्यावरण असंतुलन और आपदाएं: कब जागेगी व्यवस्था?
यह घटना न सिर्फ एक परिवार के लिए पीड़ा है, बल्कि यह प्राकृतिक आपदाओं और मानवजनित पर्यावरणीय असंतुलन पर भी बड़ा सवाल खड़ा करती है। लगातार विकास कार्य, बिना प्लानिंग के निर्माण, और पेड़ों की कटाई से हिमालयी क्षेत्र आज भूस्खलन और बादल फटने जैसी घटनाओं की चपेट में आ गया है।
समापन: अजीत का इंतजार है
पूरा उत्तराखंड, और खासकर बगासु गांव, अजीत के सही सलामत लौटने की दुआ कर रहा है। उसकी मां की आंखों में आज भी उम्मीद बाकी है, लेकिन हर बीतते पल के साथ उनका दिल बैठता जा रहा है। अब ज़रूरत है त्वरित, प्रभावी और तकनीकी सहयोग से युक्त राहत कार्यों की, ताकि अजीत और बाकी लापता लोगों को समय रहते खोजा जा सके।