विन न्यूज़ नेटवर्क। यूरोप के कई देशों में बढ़ती महंगाई, महंगे मकानों, शिक्षा की लागत और सरकारी सेवाओं की बदहाल स्थिति के खिलाफ लोगों का गुस्सा सड़कों पर दिखाई दिया। फ्रांस, अल्बानिया, इटली, पुर्तगाल और बेल्जियम में बड़ी संख्या में लोग अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करने उतरे। इन विरोध प्रदर्शनों में कहीं शांतिपूर्ण मार्च निकाले गए, तो कहीं प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हिंसक झड़पें हुईं।
आगजनी, तोड़फोड़ और गिरफ्तारियों की घटनाओं ने हालात को और गंभीर बना दिया। हालांकि, हर देश में विरोध की वजह अलग रही, लेकिन बढ़ते आर्थिक दबाव और सरकारी नीतियों को लेकर नाराजगी एक साझा मुद्दा बनकर उभरी।
फ्रांस में महंगाई और सरकारी सेवाओं को लेकर नाराजगी
फ्रांस में बढ़ती महंगाई, आर्थिक असमानता और सरकारी सेवाओं की स्थिति के खिलाफ बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, फ्रांस के गृह मंत्री लॉरेंट नुनेज़ ने करीब 5.5 लाख लोगों के प्रदर्शन में शामिल होने की बात कही, जबकि CGT ट्रेड यूनियन ने यह संख्या 8 लाख बताई।
अधिकांश स्थानों पर प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे, लेकिन कुछ शहरों में हिंसा की घटनाएं भी सामने आईं। लिमोज में सिटी हॉल में आग लगाए जाने और मार्सिले में सिटी हॉल के भीतर तोड़फोड़ की खबरें आईं। ल्योन में पर्यटन कार्यालय में भी आग लगाए जाने की सूचना मिली। पेरिस में पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए आंसू गैस का इस्तेमाल किया। कुछ दुकानों में तोड़फोड़ और लूटपाट की घटनाएं भी सामने आईं।
इन प्रदर्शनों में स्कूलों में शिक्षकों की कमी, खराब सुविधाओं और सार्वजनिक सेवाओं की स्थिति को लेकर नाराजगी भी शामिल रही। धीरे-धीरे महंगाई और आर्थिक असमानता जैसे मुद्दे भी आंदोलन का हिस्सा बन गए।
अल्बानिया में प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग तेज
अल्बानिया की राजधानी तिराना में प्रधानमंत्री एडी रामा के इस्तीफे की मांग को लेकर लगातार पांचवें दिन प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारी सरकार पर भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और शिक्षा व्यवस्था की समस्याओं को लेकर सवाल उठा रहे हैं।
प्रदर्शन के दौरान कुछ लोगों ने पुलिस पर पत्थर और पेट्रोल बम फेंके। इसके जवाब में पुलिस ने आंसू गैस और वॉटर कैनन का इस्तेमाल किया। रबर की गोलियां चलाए जाने की खबरें भी सामने आईं।
अल्बानिया के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, शनिवार को 35 लोग घायल हुए, जिनमें 18 पुलिसकर्मी और 17 प्रदर्शनकारी शामिल थे। पुलिस प्रमुख ने बताया कि सप्ताहभर के प्रदर्शनों के दौरान 167 लोगों को गिरफ्तार किया गया और 388 लोगों के खिलाफ आपराधिक मामले शुरू किए गए। प्रधानमंत्री एडी रामा ने इस्तीफा देने से इनकार किया है। वहीं, प्रदर्शनकारी सरकार से जवाबदेही और कथित भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।
इटली में बढ़ते खर्च के खिलाफ प्रदर्शन
इटली के मिलान और बोलोग्ना में भी महंगाई और रोजमर्रा की जरूरतों पर बढ़ते खर्च के खिलाफ लोग सड़कों पर उतरे। कुछ स्थानों पर प्रदर्शन हिंसक हो गए, जिसके बाद पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए आंसू गैस और वॉटर कैनन का इस्तेमाल किया।
मिलान में पुलिस ने मुख्य कैथेड्रल स्क्वायर से प्रदर्शनकारियों को हटाने की कोशिश की, जबकि बोलोग्ना में झड़पों के बाद गिरफ्तारियों की खबरें आईं। बढ़ती कीमतों और घरेलू बजट पर पड़ रहे दबाव ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है।
पुर्तगाल में महंगे मकानों ने बढ़ाई मुश्किल
पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन में हजारों लोगों ने घरों की बढ़ती कीमतों और जीवनयापन के महंगे होते खर्च के खिलाफ प्रदर्शन किया। रॉयटर्स के मुताबिक, 2017 के बाद से देश में घरों की कीमतें दोगुनी हो गई हैं। इसके चलते खासकर आम परिवारों और युवाओं के लिए घर खरीदना या किराये पर रहना मुश्किल होता जा रहा है।
प्रदर्शनकारियों ने सरकार से किफायती आवास उपलब्ध कराने और आवास संकट से निपटने के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की।
बेल्जियम में शिक्षा की लागत के खिलाफ युवाओं का विरोध
बेल्जियम की राजधानी ब्रुसेल्स में छात्रों और युवाओं ने शिक्षा की बढ़ती लागत और प्रस्तावित बदलावों के खिलाफ प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों को आशंका है कि इन बदलावों से उच्च शिक्षा हासिल करना और महंगा हो सकता है। कुछ स्थानों पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें भी हुईं।
अलग-अलग मुद्दे, लेकिन जनता की चिंता एक जैसी
यूरोप के इन पांच देशों में विरोध के कारण अलग-अलग हैं, लेकिन आर्थिक दबाव, सार्वजनिक सेवाओं की स्थिति और सरकारी नीतियों को लेकर असंतोष प्रमुखता से सामने आया है। फ्रांस में महंगाई और असमानता, अल्बानिया में राजनीतिक जवाबदेही, इटली में बढ़ता खर्च, पुर्तगाल में आवास संकट और बेल्जियम में शिक्षा की लागत अहम मुद्दे बने हुए हैं।
इन प्रदर्शनों से संबंधित सरकारों पर जनता की मांगों का जवाब देने का दबाव बढ़ा है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकारें इन शिकायतों को दूर करने के लिए क्या कदम उठाती हैं और क्या उनकी प्रतिक्रिया से सड़कों पर जारी असंतोष कम हो पाता है।