असम में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल धीरे-धीरे स्पष्ट होता जा रहा है। राज्य में धार्मिक, जातीय और क्षेत्रीय विविधताएं लंबे समय से राजनीति को प्रभावित करती रही हैं। इस बार भी चुनावी विमर्श में पहचान से जुड़े मुद्दे और कल्याणकारी योजनाएं केंद्र में हैं।
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की कोशिश में जुटी है, जबकि कांग्रेस आंतरिक मतभेदों और संगठनात्मक कमजोरियों से जूझती दिखाई दे रही है।
ध्रुवीकरण और बयानबाजी
चुनावी माहौल में मुख्यमंत्री सरमा के कुछ बयानों को लेकर विवाद भी सामने आया है। हाल ही में उनके एक बयान को लेकर विपक्ष ने तीखी प्रतिक्रिया दी। असम में स्वदेशी समुदायों और बंगाली मूल के मुस्लिम समुदाय के बीच की संवेदनशीलता इस बार भी चुनावी बहस का अहम हिस्सा बनी हुई है।
सरकार की कल्याणकारी योजनाएं
भाजपा सरकार ने बीते वर्षों में कई कल्याणकारी योजनाएं शुरू की हैं। नए साल के पहले दिन मुख्यमंत्री ने स्नातक और स्नातकोत्तर पुरुष छात्रों के लिए ‘बाबू असोनी’ योजना की घोषणा की। इसके अलावा ‘ओरुनोदोई’ योजना के तहत 37 लाख महिलाओं को 8,000 रुपये की सहायता देने की घोषणा की गई।
अन्य योजनाओं में छात्राओं के लिए ‘निजुत मोइना’, महिला उद्यमियों के लिए ‘मुख्यमंत्री महिला उद्यमिता अभियान’ और युवाओं के लिए ‘जीवन प्रेरणा’ शामिल हैं।
चुनावी प्रक्रियाओं पर सवाल
विपक्षी दलों ने विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण और 2023 के परिसीमन अभ्यास को लेकर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस सहित छह दलों ने राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को ज्ञापन सौंपकर आरोप लगाया कि वास्तविक मतदाताओं के नाम हटाने के लिए फर्जी आपत्तियां दर्ज कराई जा रही हैं।
भाजपा को बढ़त
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुख्यमंत्री की लोकप्रियता, मजबूत संगठन और सरकार की योजनाओं के कारण भाजपा को बढ़त हासिल है। फिल्मकार और पूर्व पत्रकार उत्पल बोरपुजारी के अनुसार, मुख्यमंत्री ने जनता के बीच ‘मामा’ की छवि बनाई है, जिससे उन्हें व्यापक समर्थन मिलता है।
कांग्रेस की चुनौतियां
पिछले एक दशक से सत्ता से बाहर कांग्रेस पार्टी नेतृत्व और संसाधनों की कमी से जूझ रही है। गौरव गोगोई के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद भी पार्टी में मतभेद पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। कई वरिष्ठ नेताओं के पार्टी छोड़ने से संगठन कमजोर हुआ है।
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि राज्य की सामाजिक संरचना जटिल है, जिसमें चाय जनजातियां, आदिवासी समुदाय और अल्पसंख्यक समूह शामिल हैं। इन समूहों को एकजुट करना पार्टी के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।
आगे की राह
असम में चुनावी मुकाबले में भाजपा मजबूत स्थिति में दिखाई दे रही है, जबकि विपक्ष के सामने संगठन को एकजुट करने और विश्वसनीय विकल्प पेश करने की चुनौती बनी हुई है।