अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सार्वजनिक रूप से जमकर सराहना की है और संकेत दिया है कि भारत और अमेरिका के बीच चल रही व्यापार वार्ताएं अंततः एक “अच्छे समझौते” तक पहुंचेंगी। यह टिप्पणी उन्होंने स्विट्जरलैंड के दावोस में आयोजित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दौरान भारतीय मीडिया प्लेटफॉर्म मनीकंट्रोल को दिए एक विशेष ऑन-कैमरा बयान में की। यह किसी भारतीय पत्रकार को दिया गया उनका एकमात्र वीडियो साउंडबाइट था, जिसने दोनों देशों के रिश्तों पर एक बार फिर ध्यान खींचा है।
डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी को अपना “करीबी दोस्त” बताते हुए कहा, “मुझे आपके प्रधानमंत्री के लिए बहुत सम्मान है। वह एक शानदार व्यक्ति हैं और मेरे मित्र हैं।” ट्रंप के ये शब्द ऐसे समय में आए हैं जब भारत और अमेरिका के बीच व्यापार संबंधों में लंबे समय से तनाव बना हुआ है और दोनों पक्ष उच्च-स्तरीय बातचीत के जरिए इस गतिरोध को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।
व्यापार समझौते को लेकर सकारात्मक संकेत
जब ट्रंप से सीधे तौर पर पूछा गया कि क्या भारत और अमेरिका किसी व्यापार समझौते पर पहुंच सकते हैं, तो उन्होंने संक्षिप्त लेकिन भरोसेमंद जवाब दिया। उन्होंने कहा, “हम एक अच्छा सौदा करने जा रहे हैं।” इस बयान को दोनों देशों के बीच जारी जटिल वार्ताओं के संदर्भ में अहम माना जा रहा है, क्योंकि हाल के महीनों में टैरिफ, ऊर्जा नीति और भू-राजनीतिक मुद्दों को लेकर रिश्तों में तल्खी देखी गई है।
ट्रंप का यह नरम और सकारात्मक लहजा उस पृष्ठभूमि में खास माना जा रहा है, जहां उनकी सरकार ने भारत पर भारी आयात शुल्क लगाए हुए हैं। इसके बावजूद, राष्ट्रपति के बयान से यह संकेत मिलता है कि वाशिंगटन और नई दिल्ली के बीच बातचीत के रास्ते अभी बंद नहीं हुए हैं।
रूसी तेल पर खरीदी और टैरिफ की चेतावनी
हाल के हफ्तों में ट्रंप ने भारत की रूस से तेल खरीद को लेकर सख्त रुख अपनाया है। इस महीने की शुरुआत में उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा था कि अमेरिका के दबाव के बाद भारत ने रूसी तेल का आयात कम किया है। उस समय ट्रंप ने कहा था, “वे मुझे खुश करना चाहते थे। प्रधानमंत्री मोदी बहुत अच्छे इंसान हैं। उन्हें पता था कि मैं खुश नहीं था, और मुझे खुश करना उनके लिए जरूरी था।”
भारत सरकार ने इन दावों को खारिज करते हुए साफ किया है कि उसने रूसी तेल आयात को लेकर अमेरिका को कोई आश्वासन नहीं दिया है। नई दिल्ली का कहना है कि उसकी ऊर्जा नीति पूरी तरह से राष्ट्रीय हित, ऊर्जा सुरक्षा और कीमतों की स्थिरता पर आधारित है।
ट्रंप ने चेतावनी भरे लहजे में यह भी कहा था कि अगर भारत अमेरिका के रुख के अनुरूप नहीं चलता, तो उसे व्यापारिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। उन्होंने कहा, “हम उनके साथ व्यापार करते हैं, और हम बहुत तेजी से उन पर टैरिफ बढ़ा सकते हैं। यह उनके लिए बहुत बुरा होगा।” यह बयान दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद तनाव को और उजागर करता है।
भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में बढ़ता दबाव
भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक रिश्ते फिलहाल गंभीर दबाव में हैं। ट्रंप प्रशासन ने भारतीय निर्यात पर कुल मिलाकर लगभग 50 प्रतिशत तक के टैरिफ लगाए हुए हैं। इनमें से कुछ शुल्क भारत के रूस के साथ लगातार आर्थिक और ऊर्जा सहयोग तथा ब्रिक्स समूह में उसकी भागीदारी से भी जोड़े जा रहे हैं।
इन टैरिफ का असर भारतीय उद्योगों पर पड़ा है, खासकर उन क्षेत्रों पर जो अमेरिकी बाजार पर काफी हद तक निर्भर हैं। जवाब में भारत ने भी सीमित लेकिन प्रतीकात्मक कदम उठाते हुए कुछ अमेरिकी कृषि उत्पादों पर जवाबी शुल्क लगाए हैं।
कृषि बाजार बना सबसे बड़ा रोड़ा
भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता में कृषि क्षेत्र सबसे बड़ा विवाद का मुद्दा बना हुआ है। व्हाइट हाउस लगातार भारत पर अपने कृषि बाजार को और अधिक खोलने का दबाव बना रहा है। अमेरिका चाहता है कि उसके किसानों और कृषि कंपनियों को भारतीय बाजार में ज्यादा पहुंच मिले।
लेकिन भारत के लिए यह मुद्दा बेहद संवेदनशील है। देश में करोड़ों लोगों की आजीविका कृषि पर निर्भर है, और सरकार इसे गैर-परक्राम्य विषय मानती है। नई दिल्ली का स्पष्ट रुख है कि वह अपने किसानों के हितों से समझौता नहीं करेगी, चाहे अंतरराष्ट्रीय दबाव कितना भी क्यों न हो।
ऊर्जा नीति और भू-राजनीति का असर
ट्रंप प्रशासन ने बार-बार संकेत दिया है कि टैरिफ में राहत भारत की ऊर्जा नीति से जुड़ी हो सकती है। खास तौर पर रूस से तेल खरीद को लेकर अमेरिका की आपत्तियां खुलकर सामने आई हैं। ट्रंप ने चेतावनी दी है कि यदि भारत रूसी तेल आयात जारी रखता है, तो उस पर और आर्थिक दंड लगाए जा सकते हैं।
भारत ने इस मुद्दे पर संतुलित रुख अपनाते हुए कहा है कि वह किसी एक देश के दबाव में आकर अपनी ऊर्जा जरूरतों से समझौता नहीं कर सकता। सरकार का तर्क है कि सस्ते तेल की उपलब्धता देश की अर्थव्यवस्था और आम उपभोक्ताओं के लिए जरूरी है।
रिश्तों में गर्मजोशी और सख्ती का मिश्रण
ट्रंप के हालिया बयान भारत-अमेरिका संबंधों की जटिल प्रकृति को दर्शाते हैं, जहां व्यक्तिगत स्तर पर नेताओं के बीच गर्मजोशी है, वहीं नीतिगत स्तर पर मतभेद गहरे हैं। एक ओर ट्रंप प्रधानमंत्री मोदी को दोस्त और शानदार नेता बताते हैं, दूसरी ओर वही प्रशासन भारत पर कड़े टैरिफ और चेतावनियां भी थोप रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में दोनों देशों के बीच व्यापार वार्ता निर्णायक मोड़ पर पहुंच सकती है। अगर कोई संतुलित समझौता होता है, तो इससे न सिर्फ द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि रणनीतिक साझेदारी भी मजबूत हो सकती है।
ट्रंप का “अच्छे सौदे” का संकेत बाजारों और कूटनीतिक हलकों में उम्मीद की किरण के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, वास्तविक समझौता तब ही संभव होगा जब दोनों देश कृषि, ऊर्जा और टैरिफ जैसे जटिल मुद्दों पर बीच का रास्ता निकाल सकें।
भारत और अमेरिका, दोनों ही दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं और वैश्विक राजनीति में उनकी भूमिका अहम है। ऐसे में, व्यापारिक तनाव को कम करना न केवल द्विपक्षीय हित में है, बल्कि वैश्विक आर्थिक स्थिरता के लिए भी जरूरी माना जा रहा है।