कोटा में शिक्षा की नगरी होने के बावजूद एक बार फिर हिजाब को लेकर विवाद छिड़ गया है, जिसने न केवल प्रदेश की सियासत बल्कि प्रशासन को भी सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है। बूंदी की रहने वाली अलीशा, जो रीट मेन्स लेवल-2 की परीक्षा देने महावीर नगर स्थित तिलक स्कूल केंद्र पहुंची थीं, को हिजाब हटाने के लिए मजबूर किया गया। इस पर अलीशा ने अपनी बरसों की मेहनत को दांव पर लगाते हुए परीक्षा छोड़ने का साहसिक फैसला लिया।
स्वाभिमान के लिए जोखिम उठाया
अलीशा ने बताया कि महिला सुरक्षा कर्मियों ने उनकी सघन तलाशी ली और हिजाब खोलकर जांच की, लेकिन कोई आपत्तिजनक वस्तु नहीं मिली। बावजूद इसके उन्हें हिजाब पहनकर परीक्षा कक्ष में प्रवेश की अनुमति नहीं दी गई। अलीशा ने भावुक होकर कहा, “इतने बच्चों के बीच सिर खोलना मेरे लिए अपमानजनक था। यह सिर्फ परीक्षा नहीं, मेरे आत्मसम्मान का सवाल था।”
गाइडलाइंस और मौखिक आदेशों पर उठे सवाल
छात्रा का आरोप है कि कर्मचारी चयन बोर्ड के नियमों के तहत दुपट्टा या चुन्नी पहनने की अनुमति है। लेकिन इस केंद्र पर अचानक मौखिक आदेशों के कारण उन्हें प्रवेश से रोका गया। अलीशा के प्रवेश पत्र पर लगी फोटो भी हिजाब में है और उसने पहले कई परीक्षाएं इसी लिबास में दी हैं। इस मामले ने सवाल खड़ा कर दिया है कि नियम अचानक क्यों बदल गए और क्या धार्मिक पहचान को इन नियमों से पहले रखा जा सकता है।
सिस्टम की हठधर्मिता ने छीना भविष्य
दोपहर 1 बजे से 2 बजे तक अलीशा और उनके पिता ने केंद्र प्रभारी से गुहार लगाई, लेकिन प्रशासन की कठोरता के कारण वह परीक्षा में शामिल नहीं हो सकीं। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, और इसके बाद हिजाब और व्यक्तिगत गरिमा बनाम नियम की बहस तेज़ हो गई।
राजनीति और प्रशासन पर दबाव
यह मामला केवल एक छात्रा तक सीमित नहीं रहा। राजस्थान की सियासत में भी इसे लेकर बहस छिड़ गई। विशेषज्ञों का कहना है कि शिक्षा और धर्म दोनों ही संवेदनशील विषय हैं, और ऐसे मामलों में प्रशासन को संवेदनशीलता दिखाना जरूरी है।
कोटा का यह हिजाब विवाद यह सवाल उठाता है कि क्या नियम और परीक्षा की प्रक्रिया व्यक्तिगत धार्मिक मान्यताओं और आत्मसम्मान से ऊपर हैं। अलीशा की बहादुरी ने दिखाया कि जब आत्मसम्मान की बात आती है, तो कई बार विद्यार्थी अपनी मेहनत और सपनों को भी जोखिम में डालने से नहीं हिचकिचाते।