उस्मान हादी हत्याकांड में वांछित और चिन्हित आरोपी फैसल करीम मसूद को लेकर बांग्लादेश की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। भारतीय खुफिया एजेंसियों का मानना है कि मसूद को बांग्लादेश से बाहर भेजा जाना किसी सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा नहीं था, बल्कि यह एक सोची-समझी रणनीति हो सकती है, जिसका उद्देश्य देश के भीतर बढ़ते राजनीतिक और सार्वजनिक दबाव से ध्यान हटाना और जांच को कमजोर करना था। खुफिया सूत्रों के अनुसार, मसूद का देश से बाहर जाना बिना उच्च स्तरीय प्रशासनिक जानकारी और अनुमति के संभव नहीं है। वह एक अधिसूचित व्यक्ति है और ऐसे व्यक्ति की अंतरराष्ट्रीय आवाजाही सामान्य रूप से आव्रजन और सुरक्षा एजेंसियों की मंजूरी के बिना नहीं हो सकती। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या उसे जानबूझकर बाहर भेजा गया।
इस पूरे मामले में उस समय और संदेह गहरा गया जब सोशल मीडिया पर एक वीडियो सामने आया, जिसमें मसूद खुद को दुबई में होने का दावा करता दिख रहा है। हालांकि खुफिया एजेंसियों का कहना है कि यह वीडियो किसी तटस्थ पृष्ठभूमि में रिकॉर्ड किया गया है, जिसमें न तो स्थान की पुष्टि हो पाती है और न ही इसकी फॉरेंसिक जांच हुई है। एजेंसियों को आशंका है कि यह वीडियो मसूद के देश छोड़ने से पहले रिकॉर्ड किया गया हो सकता है और बाद में जानबूझकर जारी किया गया, ताकि यह संदेश दिया जा सके कि आरोपी अब बांग्लादेश की पहुंच से बाहर है। सूत्रों के अनुसार, यह कदम घरेलू स्तर पर बढ़ते जनाक्रोश को शांत करने और यह दिखाने के लिए उठाया गया कि अब मामले में सरकार कुछ नहीं कर सकती।
भारतीय एजेंसियों ने यह भी नोट किया है कि मसूद के दुबई जाने के दावे को लेकर कोई ठोस तकनीकी या दस्तावेजी प्रमाण साझा नहीं किया गया है। आमतौर पर ऐसे संवेदनशील मामलों में उड़ान विवरण, यात्री सूची, ट्रांजिट रिकॉर्ड और अन्य यात्रा संबंधी सूचनाएं साझा की जाती हैं, लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं हुआ। खुफिया सूत्रों का कहना है कि इस तरह की चुप्पी इस ओर इशारा करती है कि पूरी प्रक्रिया को जानबूझकर गोपनीय रखा गया।
दिलचस्प बात यह है कि शुरुआत में बांग्लादेशी पक्ष ने यह दावा किया था कि मसूद भारत में मेघालय सीमा के रास्ते दाखिल हुआ है और इसके लिए उसे भारतीय पक्ष से मदद मिली। लेकिन महज 48 घंटे के भीतर इस दावे को बदल दिया गया और दुबई जाने की नई कहानी सामने लाई गई। इस अचानक बदले रुख को भारतीय एजेंसियां तथ्यों पर आधारित जांच के बजाय “नैरेटिव मैनेजमेंट” के रूप में देख रही हैं। उनका मानना है कि जांच की दिशा बदलकर घरेलू आलोचना से बचने की कोशिश की गई।
भारतीय पक्ष का यह भी कहना है कि किसी भी विश्वसनीय अंतरराष्ट्रीय जांच में इस तरह बार-बार कहानी बदलना संदेह को और गहरा करता है। अगर मसूद सच में देश से बाहर गया है, तो उससे जुड़े सबूत और यात्रा विवरण साझा किए जाने चाहिए थे। लेकिन ऐसा न होना इस बात की ओर संकेत करता है कि मामला जितना बताया जा रहा है, उससे कहीं अधिक जटिल है।
सूत्रों के मुताबिक, बांग्लादेश में जैसे-जैसे उस्मान हादी हत्याकांड को लेकर जन दबाव बढ़ा, वैसे-वैसे सरकार की स्थिति असहज होती गई। ऐसे में आरोपी को देश से बाहर दिखाकर यह संदेश देने की कोशिश की गई कि अब वह स्थानीय कानून व्यवस्था के दायरे में नहीं है। इससे न केवल घरेलू आक्रोश को ठंडा करने की कोशिश हुई, बल्कि जांच की जिम्मेदारी भी बाहरी कारकों पर डाल दी गई।
भारतीय खुफिया एजेंसियों का साफ कहना है कि इस तरह के मामलों में पारदर्शिता और सहयोग बेहद जरूरी होता है। लेकिन मौजूदा घटनाक्रम में पारदर्शिता की कमी और बार-बार बदली जा रही कहानियां इस पूरे मामले को और संदिग्ध बनाती हैं। जब तक मसूद की वास्तविक लोकेशन, यात्रा विवरण और उसे बाहर भेजने की प्रक्रिया पर स्पष्टता नहीं आती, तब तक यह सवाल बना रहेगा कि क्या वाकई घरेलू दबाव से बचने के लिए उसे देश से बाहर भेजा गया। यह मामला अब केवल एक हत्या की जांच तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह शासन, जवाबदेही और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की विश्वसनीयता से भी जुड़ गया है