गोवा के अरपोरा गांव में 6 दिसंबर को हुए भीषण नाइटक्लब अग्निकांड की जांच में चौंकाने वाली सच्चाई सामने आई है। इस हादसे में 25 लोगों की जान चली गई थी। मजिस्ट्रियल जांच रिपोर्ट ने साफ कर दिया है कि इस त्रासदी के पीछे केवल एक हादसा नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही, नियमों की अनदेखी और कई सरकारी संस्थाओं की विफलता जिम्मेदार है। जांच में स्थानीय पंचायत, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (PCB) और गोवा कोस्टल ज़ोन मैनेजमेंट अथॉरिटी (GCZMA) की गंभीर चूक सामने आई है।
यह आग ‘द बिर्च बाय रोमियो लेन’ नामक नाइटक्लब में लगी थी, जो उत्तरी गोवा के एक लोकप्रिय पर्यटन क्षेत्र में स्थित है। हादसे के बाद पूरे राज्य में गुस्सा फैल गया और गोवा के नाइटलाइफ सेक्टर में सुरक्षा मानकों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए।
इस मामले में नाइटक्लब के मालिक सौरभ और गौरव लूथरा को थाईलैंड से डिपोर्ट कर भारत लाया गया। गोवा पुलिस ने दोनों को हिरासत में लिया और उनके खिलाफ गैर-इरादतन हत्या, सुरक्षा नियमों के उल्लंघन और घोर लापरवाही समेत कई धाराओं में मामला दर्ज किया गया। शुक्रवार को गोवा की एक अदालत ने दोनों की पुलिस हिरासत 29 दिसंबर तक बढ़ा दी।
जांच में क्या सामने आया?
मजिस्ट्रियल जांच की प्रमुख रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले में “प्राथमिक जिम्मेदारी” स्थानीय पंचायत की है। जांच में पाया गया कि नाइटक्लब का ट्रेड लाइसेंस मार्च 2024 में ही समाप्त हो चुका था, इसके बावजूद पंचायत ने न तो क्लब को सील किया और न ही उसके संचालन पर रोक लगाई।
एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि पंचायत ने भले ही इमारत को गिराने का आदेश जारी किया था, लेकिन आदेश पर रोक लगने से पहले निर्माण को ध्वस्त करने के लिए जो समय मिला, उसमें भी कोई कार्रवाई नहीं की गई। इस निष्क्रियता के कारण क्लब बेरोकटोक चलता रहा।
जांच में यह भी सामने आया कि जिस संपत्ति पर यह नाइटक्लब संचालित हो रहा था, वह वर्ष 1996 से अस्तित्व में थी और वहां पहले दो रेस्तरां चल रहे थे। इसके बावजूद गंभीर सवाल उठे हैं कि पंचायत ने कैसे और किन आधारों पर इस क्लब को कई तरह की अनुमति और नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) जारी कर दिए।
सात से अधिक मंजूरियां, फिर भी सुरक्षा शून्य
जांच रिपोर्ट के अनुसार, क्लब को संचालन के लिए कम से कम सात तरह की मंजूरी दी गई थी। इनमें ट्रेड लाइसेंस, एक्साइज लाइसेंस, फूड सेफ्टी लाइसेंस, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अनुमति और तीन अलग-अलग एनओसी शामिल थीं। हैरानी की बात यह है कि यह सभी मंजूरियां तब दी गईं, जब निर्माण को लेकर पहले से शिकायतें मौजूद थीं।
शिकायतों में आरोप लगाया गया था कि क्लब का निर्माण एक इको-सेंसिटिव ज़ोन में किया गया है और उसके पास ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट तक नहीं है। इसके बावजूद पंचायत और संबंधित विभागों ने आंखें मूंदे रखीं।
GCZMA भी जांच के घेरे में
गोवा कोस्टल ज़ोन मैनेजमेंट अथॉरिटी (GCZMA) की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। जांच में सामने आया है कि GCZMA को इस नाइटक्लब के खिलाफ दो औपचारिक शिकायतें मिली थीं। इन शिकायतों में आरोप था कि क्लब का निर्माण कोस्टल रेगुलेशन ज़ोन (CRZ) नियमों का उल्लंघन कर एक इको-सेंसिटिव सॉल्ट पैन क्षेत्र में किया गया है।
इसके बावजूद GCZMA ने समय रहते कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। यदि शिकायतों पर कार्रवाई होती, तो संभव है कि क्लब का संचालन पहले ही बंद हो जाता और यह भयावह हादसा टल सकता था।
प्रशासनिक विफलता की कीमत 25 जानें
इस पूरे मामले ने यह साफ कर दिया है कि गोवा में नाइटलाइफ से जुड़े प्रतिष्ठानों की निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था में गंभीर खामियां हैं। पंचायत, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और तटीय नियामक संस्थाओं के बीच समन्वय की कमी और नियमों के पालन में ढिलाई ने इस त्रासदी को जन्म दिया।
अब जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि इन सभी मंजूरियों के पीछे किसकी जिम्मेदारी थी और किन अधिकारियों ने नियमों को नजरअंदाज किया। सरकार पर भी दबाव बढ़ रहा है कि वह दोषी अधिकारियों और संस्थाओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई करे।
गोवा नाइटक्लब अग्निकांड केवल एक हादसा नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही का भयावह उदाहरण बन चुका है। इस घटना ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि अगर समय रहते नियमों का पालन कराया जाता, तो क्या 25 लोगों की जान बचाई जा सकती थी?