अमेरिका में जन्मसिद्ध नागरिकता (Birthright Citizenship) को लेकर लंबे समय से चल रहा विवाद एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा जारी उस विवादित आदेश की संवैधानिकता पर अब अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट सुनवाई करने जा रहा है, जिसमें यह प्रावधान किया गया था कि अमेरिका में अवैध रूप से मौजूद या अस्थायी वीज़ा पर आए विदेशी नागरिकों के यहां जन्म लेने वाले बच्चों को स्वतः अमेरिकी नागरिकता नहीं दी जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार, 5 दिसंबर 2025, को इस मामले को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया। अदालत के इस निर्णय के बाद यह मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक, कानूनी और सामाजिक स्तर पर गहन बहस का केंद्र बन गया है। ट्रंप प्रशासन के कार्यकाल में जारी यह आदेश अमेरिकी आव्रजन (इमिग्रेशन) नीति में सबसे विवादित कदमों में से एक माना गया था।
आव्रजन नीति में कड़े बदलाव का हिस्सा था आदेश
ट्रंप ने अपने राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान आव्रजन पर नियंत्रण कड़ा करने के लिए कई कदम उठाए थे। इन्हीं में से एक था यह आदेश, जिसे प्रशासन ने “अमेरिकी नागरिकता प्रणाली की सुरक्षा” के नाम पर लागू करने का प्रयास किया था।
उनका तर्क था कि अवैध या अस्थायी रूप से उपस्थित व्यक्तियों के यहां जन्म लेने वाले बच्चों को स्वतः नागरिकता मिलना देश की आव्रजन व्यवस्था पर दबाव बढ़ाता है और इसका दुरुपयोग भी हो सकता है।
हालाँकि, आदेश के विरोधियों ने इसे अमेरिका के संविधान के 14वें संशोधन के सीधे उल्लंघन के रूप में देखा। उनका कहना था कि संविधान स्पष्ट रूप से अमेरिका में जन्म लेने वाले हर व्यक्ति को नागरिकता का अधिकार देता है—भले ही उनके माता-पिता की आव्रजन स्थिति कुछ भी हो।
कानूनी लड़ाई और विभिन्न अदालतों के फैसले
ट्रंप के इस आदेश को लागू करने के खिलाफ कई मानवाधिकार संगठनों, नागरिक अधिकार समूहों और राज्यों ने अदालतों का रुख किया। निचली अदालतों और अपीलीय अदालतों में इस आदेश के खिलाफ कई निर्णय आए, जिनमें कहा गया कि राष्ट्रपति का यह कदम संवैधानिक प्रावधानों और स्थापित मानकों से मेल नहीं खाता।
इन विरोधी फैसलों के चलते यह आदेश पूरी तरह लागू नहीं हो पाया। अब जब सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे की सुनवाई के लिए सहमति दे दी है, तो यह तय होगा कि राष्ट्रपति को जन्मसिद्ध नागरिकता में बदलाव करने का अधिकार है या यह शक्ति सिर्फ संविधान संशोधन के माध्यम से ही संभव है।
संविधान के 14वें संशोधन पर केंद्रित होगा फैसला
अमेरिकी संविधान का 14वां संशोधन लंबे समय से देश की नागरिकता व्यवस्था की आधारशिला माना जाता है। इसमें कहा गया है कि अमेरिका में जन्म लेने वाला हर व्यक्ति अमेरिकी नागरिक है। ट्रंप प्रशासन की व्याख्या थी कि यह प्रावधान उन लोगों पर लागू नहीं होता जो देश में कानूनी रूप से मौजूद नहीं हैं। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि संवैधानिक भाषा स्पष्ट और व्यापक है, जिसे बदलने या उसकी नई व्याख्या करने के गंभीर कानूनी परिणाम हो सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट का फैसला केवल इस आदेश तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह भविष्य में अमेरिका की आव्रजन नीति और नागरिकता को लेकर होने वाली सभी बहसों पर बड़ा असर डालेगा।
राजनीतिक तकरार भी जोर पकड़ रही है
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के इस कदम ने अमेरिकी राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। ट्रंप के समर्थक इसे “अमेरिकी हितों की रक्षा” वाला निर्णय बताते हैं, जबकि विरोधी इसे “संवैधानिक अधिकारों के लिए खतरा” मानते हैं। रिपब्लिकन नेताओं का कहना है कि यह आदेश अवैध प्रवासन को रोकने में मददगार होगा और अमेरिका की सामाजिक-आर्थिक प्रणाली पर होने वाले दबाव को कम करेगा। वहीं डेमोक्रेटिक पार्टी का तर्क है कि अमेरिका की पहचान हमेशा से प्रवासी-समर्थक रही है, और जन्मसिद्ध नागरिकता का हटना या सीमित होना अमेरिका के मूल सिद्धांतों पर चोट है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर टिकी सबकी निगाहें
अब पूरा देश सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई का इंतज़ार कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला न केवल संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा है, बल्कि यह सवाल भी उठाता है कि क्या राष्ट्रपति को ऐसे मौलिक प्रावधानों को कार्यकारी आदेशों के माध्यम से बदलने की अनुमति दी जा सकती है। जैसे-जैसे सुनवाई आगे बढ़ेगी, यह स्पष्ट होगा कि अदालत किस व्याख्या को सही मानती है—संविधान के व्यापक और ऐतिहासिक प्रावधान को, या ट्रंप प्रशासन की उस व्याख्या को जो नागरिकता को माता-पिता की आव्रजन स्थिति से जोड़ती है।
एक बात निश्चित है कि सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय अमेरिका की नागरिकता व्यवस्था, राजनीतिक बहस और आव्रजन नीति के भविष्य पर गहरा प्रभाव डालेगा।