सिविल सेवा परीक्षाओं के प्रशिक्षक अवध ओझा ने राजनीति से संन्यास लेने का ऐलान किया है। पिछले साल दिल्ली विधानसभा चुनाव में उन्होंने आम आदमी पार्टी (AAP) के टिकट पर पतपर्गंज विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा था, लेकिन भाजपा के उम्मीदवार रविंदर सिंह नेगी के हाथों लगभग 28,000 वोटों के अंतर से हार गए। अपनी हार के लगभग 10 महीने बाद, ओझा ने राजनीतिक जीवन से दूरी बनाने का फैसला लिया और सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए इसे सार्वजनिक किया।
अपने संन्यास की घोषणा के साथ, ओझा ने पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल, पूर्व उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, संजय सिंह और AAP के सभी कार्यकर्ताओं और नेताओं को विशेष धन्यवाद दिया। उन्होंने लिखा कि उन्हें पार्टी और जनता द्वारा जो प्यार और सम्मान मिला, उसके लिए वे हमेशा ऋणी रहेंगे। अपने पोस्ट में ओझा ने कहा, “राजनीति से संन्यास मेरा व्यक्तिगत निर्णय है। अरविंद जी, आप एक महान नेता हैं। जय हिंद।” इसके साथ ही उन्होंने पतपर्गंज के निवासियों का भी आभार जताया, जिन्होंने उन्हें चुनाव के दौरान भरपूर समर्थन और प्यार दिया।
ओझा का यह कदम इस बात को भी दर्शाता है कि वे अब पूरी तरह अपने शैक्षणिक करियर पर ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं। वे सिविल सेवा परीक्षाओं के प्रशिक्षक होने के साथ-साथ एक मोटिवेशनल स्पीकर भी हैं। राजनीति में कदम रखने से पहले वे शिक्षा के क्षेत्र में ही प्रसिद्ध थे और अपने विद्यार्थियों के बीच लोकप्रियता हासिल कर चुके थे। उन्होंने स्पष्ट किया है कि वे किसी अन्य पार्टी में शामिल नहीं होंगे और राजनीति में फिर कभी सक्रिय नहीं होंगे।
AAP के वरिष्ठ नेता और पूर्व विधायक सोमनाथ भारती ने ओझा के इस पोस्ट पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने लिखा, “मुझे आपके प्रति व्यक्तिगत सम्मान है, लेकिन राजनीति कोई अल्पकालिक परियोजना नहीं है।” भारती ने यह भी कहा कि ओझा जैसे अनुभव और प्रतिष्ठा वाले व्यक्ति को राजनीति में कदम रखने से पहले विकल्पों पर गंभीर विचार करना चाहिए था, विशेष रूप से AAP के साथ।
सोमनाथ भारती ने यह भी याद दिलाया कि पतपर्गंज का टिकट कई ऐसे कार्यकर्ताओं के लिए भी उपलब्ध हो सकता था, जिन्होंने शुरुआत से पार्टी के लिए कठिन परिश्रम किया है। लेकिन पार्टी ने ओझा को यह अवसर दिया, यह विश्वास करते हुए कि वे चुनाव के परिणाम की परवाह किए बिना पार्टी के साथ मिलकर काम करेंगे। उन्होंने AAP को “भारत का भविष्य” बताते हुए कहा कि कोई अन्य पार्टी शिक्षा, स्वास्थ्य और आम लोगों की बुनियादी जरूरतों पर इस तरह फोकस नहीं करती।
भारती ने अपने पोस्ट में भाजपा और कांग्रेस नेताओं की आलोचना करते हुए कहा कि वे आम जनता की समस्याओं और जीवन की मूलभूत चिंताओं पर बात नहीं करते। उन्होंने रेखांकित किया कि आम जनता के मुद्दों को लेकर सिर्फ AAP ही लगातार काम करती है। उन्होंने ओझा को यह भी याद दिलाया कि “कृपया BJP और कांग्रेस नेताओं के भाषण सुनिए, कोई भी आम लोगों की बुनियादी परेशानियों पर बात नहीं करता। यह उचित नहीं है, ओझा जी।”
अवध ओझा को राजनीतिक यात्रा के दौरान एक चुनौतीपूर्ण माहौल का सामना करना पड़ा। उन्हें पतपर्गंज से मनीष सिसोदिया के स्थान पर मैदान में उतारा गया था, जिन्होंने 2013, 2015 और 2020 के चुनाव में यह सीट जीती थी। जबकि सिसोदिया ने जंगपुरा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा, ओझा को भाजपा उम्मीदवार ने भारी अंतर से मात दी। यह हार AAP के लिए भी एक महत्वपूर्ण संकेत थी, क्योंकि पार्टी ने पिछले एक दशक में सत्ता खो दी थी।
ओझा का राजनीतिक संन्यास यह दर्शाता है कि वे अपनी पहचान को राजनीति के बजाय शिक्षा और प्रशिक्षण के क्षेत्र में बनाए रखना चाहते हैं। उनका कहना है कि उनकी प्राथमिकता विद्यार्थियों और उम्मीदवारों को मार्गदर्शन प्रदान करना और उन्हें सिविल सेवा परीक्षा में सफलता दिलाना है। वे सोशल मीडिया पर भी लोकप्रिय हैं और लाखों छात्रों के लिए प्रेरणा का स्रोत बने हुए हैं।
इस पूरी घटना से यह स्पष्ट होता है कि राजनीति में प्रवेश और उसकी चुनौतियां व्यक्ति के अनुभव और धैर्य का परीक्षण करती हैं। AAP के वरिष्ठ नेताओं का रुख यह दर्शाता है कि पार्टी कार्यकर्ताओं की मेहनत और निष्ठा को महत्व देती है, और राजनीतिक निर्णय केवल परिणामों पर नहीं, बल्कि लंबे समय तक पार्टी और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता पर आधारित होते हैं।
अवध ओझा का संन्यास केवल उनके व्यक्तिगत निर्णय का परिणाम नहीं है, बल्कि यह उस वास्तविकता का प्रतीक भी है कि राजनीति में कदम रखने से पहले व्यापक योजना और समझदारी आवश्यक है। उनका अनुभव, शिक्षण के क्षेत्र में प्रतिष्ठा और सामाजिक नेटवर्क उन्हें अब भी एक प्रभावशाली व्यक्ति बनाते हैं, और वे आगामी वर्षों में शिक्षा और मार्गदर्शन के क्षेत्र में अपनी भूमिका जारी रखेंगे।
अवध ओझा ने राजनीति के अपने छोटे लेकिन प्रभावशाली दौर को समाप्त किया है। उनके संन्यास और AAP नेताओं की प्रतिक्रिया ने यह संकेत दिया है कि भारतीय राजनीति में अनुभव, प्रतिबद्धता और जनता के प्रति समर्पण का महत्व सर्वोपरि है। ओझा का उदाहरण यह भी दिखाता है कि राजनीतिक जीवन में असफलता से हतोत्साहित होने के बजाय व्यक्ति अपने मूल क्षेत्र में योगदान दे सकता है और समाज में सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।