तिरुवनंतपुरम: केरल में फिर से मसाला बॉन्ड को लेकर बहस तेज हो गई है। यह बॉन्ड केरल इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट फंड बोर्ड (KIIFB) द्वारा जारी किया गया था, जो राज्य सरकार की बड़ी अवसंरचना परियोजनाओं के लिए प्रमुख वित्तीय संस्था है। मसाला बॉन्ड एक ऐसा वित्तीय साधन है, जिसमें विदेशी निवेशक रुपये में निवेश करते हैं और KIIFB को परियोजनाओं के लिए रुपये में फंडिंग मिलती है। केरल ने इस बॉन्ड के जरिए 2019 में कुल ₹2,150 करोड़ जुटाए थे।
बॉन्ड की खासियत यह है कि इसमें मुद्रा विनिमय (Forex) का जोखिम निवेशक पर होता है, जबकि राज्य को परियोजनाओं के लिए तुरंत धन प्राप्त होता है। शुरू में इसे राज्य के लिए एक महत्वपूर्ण कदम माना गया, क्योंकि इससे अवसंरचना परियोजनाओं को तेजी से फंडिंग मिली और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों का भरोसा भी बढ़ा।
हालांकि, समय के साथ इस बॉन्ड से जुड़े कई सवाल उठने लगे। आलोचकों ने इसकी उच्च ब्याज दर को राज्य के लिए बोझिल बताया। साथ ही, कुछ फंडों का उपयोग भूमि अधिग्रहण और अन्य परियोजनाओं में किया गया, जिससे Enforcement Directorate (ED) और विपक्ष ने इसे विदेशी मुद्रा कानून (FEMA) के उल्लंघन के रूप में देखा। इसके अलावा, कुछ परियोजनाएं तत्काल राजस्व नहीं ला रही थीं, जिससे बॉन्ड पर ब्याज और मूलधन लौटाने में वित्तीय दबाव बढ़ गया। विपक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि सरकार और KIIFB ने फंड के इस्तेमाल और ऑडिटिंग में पारदर्शिता नहीं दिखाई।
दूसरी ओर, KIIFB और राज्य सरकार का दावा है कि सभी फंड का उपयोग कानूनी और नियमानुसार किया गया और बॉन्ड समय पर परिपक्वता तक चुकाया जाएगा। KIIFB का कहना है कि भूमि अधिग्रहण पर खर्च मामूली था और आरोपित राशि का कोई वास्तविक आधार नहीं है। सरकार ने यह भी बताया कि मसाला बॉन्ड जारी करना राज्य के लिए एक मील का पत्थर था, जिससे अंतरराष्ट्रीय निवेशकों से पूंजी जुटाने का अवसर मिला और अवसंरचना परियोजनाओं के लिए वित्तीय विकल्प बढ़े।
2025 में ED ने कुछ अधिकारियों और मुख्यमंत्री को नोटिस जारी किया, जिससे विवाद और बढ़ गया। KIIFB ने इस नोटिस पर सवाल उठाते हुए कहा कि विदेशी मुद्रा से जुड़ी जांच केवल RBI कर सकता है, न कि ED।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद बड़े वित्तीय फैसलों में पारदर्शिता, जवाबदेही और नियमन पालन की अहमियत को रेखांकित करता है। मसाला बॉन्ड एक साहसिक और लाभकारी कदम था, लेकिन इसने यह भी दिखाया कि अगर नियामक अनुपालन और ऑडिटिंग सही तरीके से न हो, तो विकास प्रयास विवाद और जोखिमों के बीच फंस सकते हैं।
वर्तमान में मामला अदालत, ED और मीडिया में उभरा हुआ है, और आने वाले महीनों में इसके परिणाम वित्तीय, कानूनी और राजनीतिक रूप से देखने को मिल सकते हैं। केरल के लिए सबसे अच्छा परिणाम वही होगा जिसमें राज्य की अवसंरचना विकास की गति बनी रहे और साथ ही जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित हो, ताकि भविष्य में ऐसे वित्तीय साधन सुरक्षित और भरोसेमंद साबित हों।