विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद बिहार कांग्रेस अब अपनी राजनीतिक दिशा पर नए सिरे से सोच रही है और लंबे समय बाद स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। पार्टी के अंदर यह महसूस किया जा रहा है कि वर्षों तक गठबंधन की राजनीति में शामिल रहने से उसकी खुद की पहचान कमजोर हो गई है। खासकर राजद के साथ चलते-चलते कांग्रेस की भूमिका सीमित दिखाई देने लगी, जिस वजह से संगठन जमीन स्तर पर कमजोर हो गया।
कई नेताओं ने कहा कि जब पार्टी किसी गठबंधन का हिस्सा होती है, तो उसके उम्मीदवारों का चयन दूसरे दलों की प्राथमिकताओं और समीकरणों के आधार पर तय होता है, जिससे कांग्रेस को अपने असली समर्थकों और कार्यकर्ताओं के साथ मजबूत पकड़ बनाने का मौका नहीं मिल पाता। इन्हीं कारणों को देखते हुए पार्टी अब “एकला चलो” यानी स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने के विकल्प को गंभीरता से विचार कर रही है, ताकि वह अपनी अलग और प्रभावशाली पहचान फिर से बना सके। पार्टी की हाल की समीक्षा बैठकों में यह बात सामने आई कि संगठन को जिला, ब्लॉक और बूथ स्तर तक नए सिरे से मजबूत करने की जरूरत है। नेताओं का मानना है कि कांग्रेस को केवल चुनाव के वक्त सक्रिय होने की बजाय पूरे साल जनता के बीच रहकर अपनी उपस्थिति महसूस करवानी होगी, ताकि कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़े और जनता में यह संदेश जाए कि कांग्रेस अब एक मजबूत और स्वतंत्र विकल्प बनना चाहती है। कई नेताओं ने यह भी कहा कि स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने से पार्टी को दो बड़े फायदे मिल सकते हैं पहला, उसकी अपनी राजनीतिक पहचान फिर से उभर कर सामने आएगी, और दूसरा, पार्टी का संगठन खुद अपनी क्षमता की आधार पर विकास कर सकेगा। हाल की हार से यह भी स्पष्ट हुआ कि कांग्रेस चुनावी प्रबंधन, सोशल मीडिया, और बूथ स्तर की मजबूत तैयारी में पीछे रह गई थी, इसलिए अब इन सभी क्षेत्रों में सुधार के लिए विस्तृत योजना बनाई जा रही है।
प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम ने कहा कि पार्टी अभी जल्दबाजी में कोई अंतिम फैसला नहीं लेगी, लेकिन यह साफ है कि अब कांग्रेस बिना सोचे-समझे किसी गठबंधन में शामिल नहीं होगी। उनका कहना है कि जब अगला चुनाव नजदीक आएगा, तब पार्टी अपने संगठन की मजबूती और राजनीतिक परिस्थितियों को देखकर ही आगे की रणनीति तय करेगी। फिलहाल पूरा ध्यान इस बात पर है कि पार्टी जमीनी स्तर पर फिर से सक्रिय हो, नए कार्यकर्ताओं को जोड़े, और जनता का विश्वास वापस जीतने में सफल हो। कांग्रेस को भरोसा है कि यदि वह आने वाले वर्षों में खुद को एक मजबूत विकल्प के रूप में पेश कर पाई, तो अकेले चुनाव लड़ने की रणनीति उसे नई ताकत दे सकती है और बिहार की राजनीति में उसके लिए एक नई जगह बना सकती है।