अयोध्या से उभरता नया भारत: पीएम के संबोधन में सांस्कृतिक आत्मविश्वास और विकास का संदेश

Vin News Network
Vin News Network
5 Min Read
अयोध्या में प्रधानमंत्री ने सांस्कृतिक पुनर्जागरण, मानसिक गुलामी से मुक्ति और भारत के आर्थिक उदय पर महत्वपूर्ण संदेश दिया।

अयोध्या की धरती पर प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में भारतीय पहचान, सांस्कृतिक गौरव और विकसित भारत के संकल्प को केंद्र में रखते हुए विस्तृत विचार रखे। अपने वक्तव्य की शुरुआत उन्होंने रामायण के एक प्रसंग से की, जिसमें भरत की सेना के चित्रकूट पहुँचने पर लक्ष्मण दूर से ही अयोध्या की सेना को पहचान लेते हैं। वाल्मीकि रामायण के अनुसार अयोध्या की सेना पर एक विशेष ध्वज फहराया करता था—धर्म ध्वज, जिस पर कोविदार वृक्ष अंकित था। प्रधानमंत्री ने इस संदर्भ के माध्यम से यह संदेश दिया कि पहचान और परंपरा से जुड़ाव केवल प्रतीक नहीं होते, बल्कि सभ्यता की आत्मा को जीवित रखने वाले स्तंभ होते हैं।

उन्होंने कहा कि कोविदार वृक्ष हमें याद दिलाता है कि जब हम अपने मूल मूल्य भूल जाते हैं, तो धीरे-धीरे अपनी पहचान भी खो देते हैं। इसी भाव से आगे बढ़ते हुए उन्होंने 1835 में लॉर्ड मैकाले द्वारा स्थापित शिक्षा ढांचे का उल्लेख किया, जिसे वे मानसिक गुलामी की नींव बताते हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि अगले दस वर्षों में, जब इस व्यवस्था के 200 वर्ष पूरे होंगे, भारत को इस मानसिकता से पूर्णतः मुक्त कर एक आत्मविश्वासी और स्वाभिमानी राष्ट्र के रूप में आगे बढ़ना होगा।
प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि गुलामी की मानसिकता अभी भी कई क्षेत्रों में मौजूद है। उन्होंने नौसेना के नए ध्वज का उदाहरण दिया, जिसमें औपनिवेशिक प्रतीक को हटाकर भारतीय परंपरा के अनुरूप चिन्ह जोड़े गए। उनके अनुसार, यह बदलाव केवल प्रतीकात्मक नहीं है, बल्कि मानसिक स्वतंत्रता की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है। उन्होंने जोर देकर कहा कि इसी मानसिकता के कारण भगवान राम जैसे सांस्कृतिक आधारस्तंभों को भी कई बार काल्पनिक बताने की कोशिश की गई, जबकि भारत के कण-कण में राम की उपस्थिति महसूस की जाती है।

प्रधानमंत्री के अनुसार, आने वाले एक हजार वर्षों की मजबूत नींव तभी रखी जा सकती है जब देश अगले दस सालों में औपनिवेशिक सोच से पूरी तरह मुक्त होकर अपने मौलिक ज्ञान, परंपराओं और सांस्कृतिक आत्मविश्वास को फिर से स्थापित करे। उन्होंने अयोध्या को 21वीं सदी के विकसित भारत की रीढ़ बताते हुए कहा कि यह शहर न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि आर्थिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक भी बन रहा है। इसके बाद उन्होंने अयोध्या में हुए तेज विकास का उल्लेख किया। उनके अनुसार, आज अयोध्या में आधुनिक और भव्य रेलवे स्टेशन है, जहाँ से वंदे भारत और अमृत भारत जैसी उन्नत ट्रेनें संचालित हो रही हैं। राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के बाद लगभग 45 करोड़ श्रद्धालु अयोध्या में दर्शन के लिए पहुँच चुके हैं, जिससे स्थानीय रोजगार, व्यापार और पर्यटन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। छोटे व्यापारियों से लेकर होटल, परिवहन और हस्तशिल्प क्षेत्र तक, हर स्तर पर आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि ने लोगों की आजीविका को नई ऊर्जा दी है।

प्रधानमंत्री ने 21वीं सदी के भारत को एक निर्णायक मोड़ पर बताते हुए कहा कि पिछले 11 वर्षों में भारत विश्व की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि आने वाले समय में भारत जल्द ही दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में उभरेगा। उनके अनुसार, यह प्रगति केवल आर्थिक नहीं है, बल्कि आत्मनिर्भरता, सांस्कृतिक चेतना और वैश्विक भूमिका की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है। अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि भारत अब केवल विकास की राह पर नहीं, बल्कि पुनर्जागरण के मार्ग पर है जहाँ आधुनिकता और परंपरा, विज्ञान और संस्कृति, और आर्थिक शक्ति तथा सांस्कृतिक आत्मविश्वास साथ-साथ आगे बढ़ रहे हैं। अयोध्या इस परिवर्तन की गवाही दे रही है और आने वाले वर्षों में यह नया भारत की नेतृत्वकारी शक्ति के रूप में उभर सकती है।

Share This Article
Leave a Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *