भारत ने रूस-यूक्रेन युद्ध की शुरुआत से अब तक खुद को एक तटस्थ (Neutral) राष्ट्र के रूप में पेश किया है। चाहे प्रधानमंत्री की रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात हो या यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की से, हर बार भारत ने युद्ध समाप्त करने और शांति स्थापित करने की बात दोहराई। इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को “शांति का समर्थक” माना जाता रहा। लेकिन हाल ही में यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की ने भारत के खिलाफ एक बयान दिया, जिसमें उन्होंने टैरिफ को लेकर भारत पर सवाल उठाया। अमेरिकी टीवी चैनल के साथ उनके इंटरव्यू के वायरल होते ही सोशल मीडिया पर लोगों ने जेलेंस्की को “आईना दिखाना” शुरू कर दिया।
भारत का तटस्थ रुख – दुनिया के लिए मिसाल
रूस और यूक्रेन के बीच 24 फरवरी 2022 से युद्ध जारी है। इस दौरान भारत ने किसी भी पक्ष का खुलकर समर्थन नहीं किया। भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में रूस के खिलाफ लाए गए प्रस्तावों पर वोटिंग से कई बार दूरी बनाई, जबकि यूक्रेन को भी मानवीय सहायता दी।
भारत के विदेश मंत्रालय ने हर अवसर पर यह संदेश दिया कि युद्ध किसी समाधान का रास्ता नहीं, संवाद ही इसका रास्ता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “यह युद्ध का समय नहीं है” वाले बयान ने दुनिया का ध्यान खींचा। जेलेंस्की भी कई मौकों पर मान चुके हैं कि युद्ध समाप्त कराने में भारत की भूमिका सकारात्मक हो सकती है।
जेलेंस्की के ताज़ा बयान ने क्यों बढ़ाई नाराज़गी
हाल ही में जेलेंस्की ने भारत पर टैरिफ और तेल को लेकर बयान दिया। उन्होंने सवाल उठाया कि भारत रूस से तेल क्यों खरीदता है। लेकिन जैसे ही उनका इंटरव्यू वायरल हुआ, सोशल मीडिया पर भारतीय यूजर्स ने जवाब देना शुरू कर दिया। लोगों ने पूछा – “यूक्रेन भारत से रूसी डीजल से बना डीजल क्यों खरीद रहा है?” दरअसल भारत रूस से कच्चा तेल खरीदकर उसे रिफाइन करता है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में डीजल-फ्यूल के रूप में बेचता है। इसी डीजल को यूक्रेन भी खरीद रहा है।
भारत से डीजल खरीदने वाला यूक्रेन
यूक्रेन और भारत के बीच व्यापारिक संबंध अच्छे हैं। विशेष रूप से डीजल खरीद को लेकर आंकड़े चौंकाने वाले हैं: युद्ध शुरू होने से पहले यूक्रेन रूस और बेलारूस से तेल आयात करता था। फरवरी 2022 के बाद जब रूस से तेल आयात असंभव हुआ, तो यूक्रेन ने भारत को चुना। यूक्रेनी एनालिटिक्स फर्म NaftoRynok के आंकड़ों के मुताबिक 2024 में भारत का डीजल शेयर 1.9% था, जो 2025 (जनवरी–जुलाई) में बढ़कर 10.2% हो गया। अकेले जुलाई 2025 में यूक्रेन ने भारत से 15% तक डीजल आयात किया। इन आंकड़ों से साफ है कि यूक्रेन भारत के डीजल पर निर्भर हो गया है।
क्या रूसी तेल नहीं खरीदता यूक्रेन?
अमेरिका और पश्चिमी देश भारत पर रूस से तेल खरीदने को लेकर लगातार दबाव बनाते रहे हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि यूक्रेन भी अप्रत्यक्ष रूप से उसी रूसी तेल का बना डीजल खरीद रहा है। भारत रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदकर उसे प्रोसेस करता है। यही डीजल-फ्यूल बाद में विभिन्न देशों को निर्यात होता है। ऐसे में यूक्रेन का भारत पर आरोप लगाना तर्कसंगत नहीं लगता। सोशल मीडिया पर लोगों ने सवाल उठाया – “अगर भारत रूस से तेल खरीदता है, तो क्या उस तेल से बना डीजल किसी और देश का है?” “भारत पर आरोप लगाने से पहले यूक्रेन को अपने आयात पर नज़र डालनी चाहिए।”
यूक्रेन के बयान से भारत को क्या संदेश?
भारत ने अब तक यूक्रेन को कई बार मानवीय सहायता भेजी है। दवाइयों, राहत सामग्री से लेकर छात्रों को युद्धग्रस्त क्षेत्र से निकालने तक, भारत ने मदद की। ऐसे में जेलेंस्की का यह बयान भारत के प्रति कूटनीतिक असंतोष के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार यह बयान संभवतः अमेरिका और यूरोपीय देशों को खुश करने के लिए दिया गया होगा। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि यूक्रेन भारत के डीजल पर निर्भर है और भारत की भूमिका उसके लिए अहम है।
भारत की कूटनीतिक मजबूती
भारत ने एक ओर रूस से अपने ऊर्जा संबंध बनाए रखे, तो दूसरी ओर पश्चिमी देशों और यूक्रेन से भी संवाद जारी रखा। भारत ने किसी भी सैन्य गठजोड़ का हिस्सा न बनते हुए रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखी। भारतीय रिफाइनरियों ने रूस से सस्ता कच्चा तेल लेकर वैश्विक ईंधन बाजार में अपनी जगह बनाई। यही वजह है कि भारत अब डीजल निर्यातक देशों की सूची में तेजी से ऊपर आया है।
जेलेंस्की का भारत पर बयान उनके देश के वास्तविक व्यापारिक आंकड़ों से मेल नहीं खाता। भारत ने तटस्थ रुख अपनाया है, शांति की बात की है और युद्ध में किसी पक्ष का खुला समर्थन नहीं किया। इसके बावजूद भारत यूक्रेन की ऊर्जा जरूरतें पूरी कर रहा है। यूक्रेन के लिए बेहतर होगा कि वह आरोप लगाने के बजाय भारत की भूमिका को समझे और दोनों देशों के संबंधों को मजबूत बनाए।