नई दिल्ली। अमेरिका और भारत के बीच टैरिफ को लेकर बढ़ा तनाव अब एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया फैसले के बाद न सिर्फ भारत, बल्कि पूरी दुनिया में इस मुद्दे पर चर्चा तेज हो गई है। अमेरिकी सांसद भी इस कदम का विरोध कर रहे हैं और इसे अपने ही देशवासियों के खिलाफ बता रहे हैं। इसके बावजूद ट्रंप अडिग हैं और भारत द्वारा रूसी तेल खरीदने को लेकर खासे नाराज़ दिखाई दे रहे हैं।
रूसी तेल खरीद पर आपत्ति
डोनाल्ड ट्रंप के शीर्ष आर्थिक सलाहकार और अमेरिकी राष्ट्रीय आर्थिक परिषद के निदेशक केविन हैसेट ने भारत को खुली चेतावनी दी है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि अगर भारत रूसी कच्चे तेल की खरीद पर लगाम लगाने में नाकाम रहा, तो राष्ट्रपति ट्रंप किसी भी सूरत में टैरिफ कम करने के लिए तैयार नहीं होंगे। यह बयान उस समय आया है जब भारत लगातार कह रहा है कि वह अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए किसी के दबाव में आने वाला नहीं है।
भारत पर लगे आरोप
हैसेट ने अपने बयान में भारत पर कई आरोप भी लगाए। उन्होंने कहा कि अमेरिका-भारत के बीच चल रही व्यापार वार्ता अब बेहद “जटिल” हो गई है और भारत अमेरिकी उत्पादों के लिए अपने बाजार खोलने को लेकर “अड़ियल” रवैया अपना रहा है। उनकी मानें तो भारत के इस रुख से व्यापार समझौते में और कठिनाई पैदा हो रही है।
ट्रंप का रुख – “झुकेंगे नहीं”
हैसेट ने आगे यह भी जोड़ा कि राष्ट्रपति ट्रंप ऐसे नेता नहीं हैं जो झुक जाएं। हाल ही में अमेरिका ने भारतीय वस्तुओं पर शुल्क बढ़ाकर 50 प्रतिशत तक कर दिया है। यह दर ब्राजील के अलावा किसी भी देश पर लगाए गए टैरिफ से ज्यादा है। इतना ही नहीं, भारत द्वारा रूसी तेल खरीद पर भी 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगाया गया है।
हैसेट का दावा है कि यह कदम केवल भारत पर दबाव बनाने के लिए है ताकि रूस के खिलाफ शांति समझौते की दिशा में कदम उठाया जा सके और लाखों लोगों की जान बचाई जा सके।
भारत का जवाब – “दबाव नहीं सहेंगे”
दूसरी ओर भारत ने अमेरिका को साफ संदेश दे दिया है कि वह किसी भी दबाव में झुकने वाला नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों और देश के हितों से कभी समझौता न करने का ऐलान किया है। भारत का मानना है कि ऊर्जा सुरक्षा उसका खुद का अधिकार है और वह अपनी ज़रूरतों के आधार पर ही फैसले करेगा।
आर्थिक असर का अनुमान
भारत सरकार का अनुमान है कि अमेरिका द्वारा लगाए गए इन टैरिफ का असर करीब 48.2 अरब डॉलर के भारतीय निर्यात पर पड़ेगा। इसमें टेक्सटाइल, ऑटो पार्ट्स, फार्मा और कृषि उत्पाद शामिल हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह टकराव अगर लंबा खिंचता है तो दोनों देशों के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है।
अमेरिका और भारत के बीच यह टैरिफ वॉर सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसमें भू-राजनीतिक दबाव भी साफ झलकता है। ट्रंप प्रशासन रूस पर प्रहार करने के लिए भारत पर दबाव डाल रहा है, वहीं भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति पर कायम रहने की बात कर रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह तनाव वार्ता से सुलझता है या फिर दुनिया को एक और बड़ी आर्थिक जंग देखने को मिलती है।