भारत में किसानों को सस्ते और आसान कर्ज देने की नीति के तहत किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) एक अहम योजना है। लेकिन ताजा आंकड़े और बैंकिंग सेक्टर से आ रही रिपोर्टों के मुताबिक, KCC खातों की संख्या में लगातार गिरावट देखी जा रही है। इसके पीछे के कारण केवल ब्याज दर या बैंक नीतियां नहीं हैं, बल्कि गांवों में बदलती आर्थिक सोच और विकल्पों की तलाश को भी इसकी बड़ी वजह माना जा रहा है।
गांवों में कर्ज लेने का तरीका बदल रहा है
बिजनेस स्टैंडर्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार, एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि अब ग्रामीण भारत में किसानों का रुख बदल रहा है। किसान परंपरागत सरकारी बैंकों से हटकर सहकारी संस्थानों, नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (NBFC) और यहां तक कि उर्वरक कार्ड जैसे विकल्पों की ओर जा रहे हैं। इससे न केवल किसानों को तात्कालिक कर्ज सुविधा मिलती है, बल्कि उन्हें बैंकों के कागजी झंझट से भी राहत मिलती है।
“अब ज़रूरत KCC जैसी नहीं रही” – PNB के एमडी
पंजाब नेशनल बैंक के एमडी और सीईओ अशोक चंद्रा ने मीडिया से बात करते हुए बताया कि KCC खातों की संख्या में गिरावट एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। उन्होंने कहा: पिछले कुछ वर्षों में सरकार और बैंकों ने मिलकर KCC योजना को जोर-शोर से लागू किया है। इसका असर यह हुआ कि अधिकांश पात्र किसानों को पहले ही KCC मिल चुका है। ऐसे में अब नए खाते खुलने की दर धीमी हो गई है। हालांकि उन्होंने ये भी माना कि KCC आज भी किसानों के लिए सबसे प्रमुख और सस्ता क्रेडिट साधन है।
KCC में गिरावट का दूसरा पहलू: खेती से मोहभंग?
आंकड़ों के अनुसार, अब देश के कई राज्यों में किसान खेती छोड़ कर अन्य क्षेत्रों में जा रहे हैं। कुछ छोटे और सीमांत किसान शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन कर रहे हैं, कुछ कृषि से जुड़ी अन्य गतिविधियों जैसे डेयरी, पोल्ट्री या मजदूरी को प्राथमिकता दे रहे हैं। इस बदलती सामाजिक संरचना का असर भी KCC खातों की संख्या पर पड़ा है, क्योंकि जो किसान अब खेती ही नहीं कर रहे, वे स्वाभाविक तौर पर KCC की जरूरत नहीं समझते।
किसान क्रेडिट कार्ड: एक सस्ता और भरोसेमंद कर्ज
KCC योजना की सबसे बड़ी खूबी इसकी सस्ती ब्याज दर है। इसके तहत:
- किसानों को 5 लाख रुपये तक का कर्ज मिलता है
- इसमें 3 लाख रुपये फसल की खेती के लिए
- और 2 लाख रुपये कृषि संबंधित दूसरे कार्यों के लिए दिए जाते हैं
- ब्याज दर सिर्फ 7% निर्धारित है
- समय पर भुगतान करने पर 2% सब्सिडी + 3% ब्याज में छूट, यानी कुल 4% ब्याज
- यह देश में मिलने वाला सबसे सस्ता खेती-केंद्रित लोन माना जाता है।
तो क्या सरकारी बैंक पिछड़ रहे हैं?
एक बड़ी बात यह भी है कि कई किसान अब सरकारी बैंकों से दूर होते जा रहे हैं। उनका मानना है कि सरकारी बैंकों की प्रक्रिया धीमी, जटिल और पेचीदा होती है, जबकि सहकारी बैंक और NBFC जैसे विकल्पों में तेजी से कर्ज, कम कागज़ी काम और ज्यादा लचीलापन होता है।
ये गिरावट चिंता का विषय या परिवर्तन का संकेत?
KCC खातों में गिरावट को जहां एक ओर सकारात्मक रूप में देखा जा सकता है (जैसे कि किसानों की आमदनी में बढ़ोतरी या विकल्पों की उपलब्धता), वहीं इसका दूसरा पहलू यह भी दिखाता है कि कहीं खेती से किसानों का जुड़ाव कमजोर तो नहीं हो रहा? यदि किसान खेती से दूर होते जा रहे हैं, या सरकारी कर्ज प्रणाली से उनका भरोसा उठ रहा है, तो यह दीर्घकालिक रूप से देश की खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण विकास के लिए गंभीर संकेत हो सकते हैं।
सरकार और बैंकों के लिए सबक
- KCC को अधिक उपयोगी बनाने के लिए इसमें तकनीकी सुधार और डिजिटल प्रोसेस जोड़े जाने चाहिए।
- किसानों के लिए ब्याज मुक्त या कम ब्याज दर की योजनाएं चालू रखनी होंगी।
- सहकारी और NBFC बैंकों को भी एक रेगुलेटेड मॉडल में लाना जरूरी है, ताकि किसान सुरक्षित रहें।