बेंगलुरु स्थित एक विशेष POCSO अदालत ने जनता दल (सेक्युलर) के निलंबित सांसद प्रज्वल रेवन्ना को रेप के एक मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई है। साथ ही अदालत ने उन पर 10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है। यह फैसला न केवल कानूनी रूप से अहम है, बल्कि यह राजनीतिक गलियारों में भी हलचल पैदा कर रहा है।
यह मामला साल 2021 का है, जब एक 48 वर्षीय महिला ने प्रज्वल रेवन्ना पर दो बार बलात्कार करने का आरोप लगाया था। पीड़िता का कहना था कि वह रेवन्ना के परिवार के फार्महाउस पर बतौर घरेलू सहायिका काम करती थी। इसी दौरान रेवन्ना ने कथित रूप से उसका यौन उत्पीड़न किया।
अदालत की टिप्पणी और फैसला
विशेष अदालत ने इस केस की सुनवाई में कहा कि— “प्रज्वल रेवन्ना का कृत्य न केवल अमानवीय है, बल्कि सत्ता और प्रभाव का दुरुपयोग भी है। ऐसे मामलों में कठोर सजा समाज को एक मजबूत संदेश देती है कि कानून सभी के लिए समान है।”
न्यायालय ने फैसला सुनाते हुए प्रज्वल रेवन्ना को IPC की धारा 376 (बलात्कार), 506 (आपराधिक धमकी), और 354 (महिला की मर्यादा का हनन) के तहत दोषी करार दिया।
जुर्माना और पीड़िता को मुआवजा
अदालत ने आरोपी पर ₹10 लाख का जुर्माना लगाया है, जिसमें से ₹7 लाख पीड़िता को मुआवजे के रूप में दिए जाएंगे। पीड़िता ने अदालत में बताया कि घटना के बाद उसे मानसिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से काफी प्रताड़ना झेलनी पड़ी।
राजनीतिक पृष्ठभूमि और प्रभाव
प्रज्वल रेवन्ना पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा के पोते हैं और कर्नाटक के हासन लोकसभा सीट से सांसद रह चुके हैं। केस दर्ज होने के बाद जेडी(एस) पार्टी ने उन्हें निलंबित कर दिया था। अब जब अदालत ने उन्हें दोषी करार दे दिया है, तो उनके राजनीतिक करियर पर स्थायी विराम लग सकता है।
क्या है CCTV, गवाह और फॉरेंसिक साक्ष्य का रोल?
इस केस की जांच के दौरान पुलिस को फार्महाउस से कुछ CCTV फुटेज और फॉरेंसिक सबूत मिले, जिससे मामले की पुष्टि हुई। साथ ही, दो महिला कर्मचारियों ने भी गवाही दी जो कोर्ट में पीड़िता के आरोपों की पुष्टि करती है। समाज में क्या संदेश जाता है यह मामला सिर्फ एक अपराध नहीं, बल्कि समाज में एक चेतावनी है — “अगर आपके पास सत्ता है, तो आप कानून से ऊपर नहीं हैं।” महिला सुरक्षा और न्याय की दिशा में यह फैसला एक मिसाल के तौर पर देखा जा रहा है।
सियासी प्रतिक्रिया और जनता का रुख
इस मामले पर कई राजनेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। महिला संगठनों ने कोर्ट के फैसले का स्वागत किया है और कहा कि— “इस तरह के निर्णय पीड़ितों को आगे आने और न्याय मांगने के लिए प्रोत्साहित करेंगे।”