विन न्यूज़ नेटवर्क। हिंदू धर्म में देवशयनी एकादशी का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। इसे हरिशयनी एकादशी और आषाढ़ी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। वर्ष 2026 में यह पावन पर्व 25 जुलाई (शनिवार) को मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान विष्णु चार माह के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं और चातुर्मास का शुभारंभ होता है।
देवशयनी एकादशी से लेकर देवउठनी एकादशी तक का समय आध्यात्मिक साधना, व्रत, जप और भक्ति का काल माना जाता है। इस अवधि में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और अन्य शुभ संस्कारों जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते।
119 दिनों तक कहां रहते हैं भगवान विष्णु?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु क्षीर सागर से योगनिद्रा के लिए पाताल लोक प्रस्थान करते हैं। कहा जाता है कि इस दौरान वे राजा बलि के महल में निवास करते हैं।
इसके पीछे वामन अवतार से जुड़ी प्रसिद्ध कथा का उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण कर राजा बलि से तीन पग भूमि का दान मांगा था। राजा बलि की भक्ति और दानशीलता से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें वरदान दिया कि प्रत्येक वर्ष चातुर्मास के दौरान वे उनके साथ निवास करेंगे। इसी कारण देवशयनी एकादशी से देवउठनी एकादशी तक भगवान विष्णु राजा बलि के यहां विश्राम करते हैं।
भगवान विष्णु के विश्राम के दौरान कौन संभालते हैं सृष्टि?
हिंदू शास्त्रों में भगवान विष्णु को सृष्टि का पालनकर्ता माना गया है। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि उनके योगनिद्रा में रहने के दौरान संसार का संचालन कौन करता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, चातुर्मास के चार महीनों में सृष्टि के संचालन और संरक्षण की जिम्मेदारी भगवान शिव संभालते हैं। यही कारण है कि चातुर्मास का पहला महीना श्रावण होता है, जो पूरी तरह भगवान शिव की आराधना के लिए समर्पित माना जाता है। इसके बाद भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक महीनों में गणेश उत्सव, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, नवरात्र, दशहरा और दीपावली जैसे प्रमुख पर्व मनाए जाते हैं।
चातुर्मास में क्यों नहीं होते विवाह और अन्य शुभ कार्य?
धार्मिक परंपराओं के अनुसार, किसी भी मांगलिक कार्य से पहले देवी-देवताओं का आवाह्न किया जाता है ताकि उनका आशीर्वाद प्राप्त हो सके। चूंकि चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं, इसलिए इस अवधि में विवाह, गृह प्रवेश, जनेऊ, मुंडन और अन्य शुभ कार्यों को टालने की परंपरा है।
मान्यता है कि पालनकर्ता भगवान विष्णु की अनुपस्थिति में किए गए मांगलिक कार्य पूर्ण फलदायी नहीं माने जाते। इसी कारण देवउठनी एकादशी के बाद ही विवाह और अन्य शुभ कार्य दोबारा शुरू होते हैं।
चातुर्मास के पीछे छिपा है वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी
धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ चातुर्मास का स्वास्थ्य से भी गहरा संबंध माना जाता है। आयुर्वेद और पारंपरिक जीवनशैली में इस दौरान सात्विक भोजन और संयमित दिनचर्या अपनाने की सलाह दी जाती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, वर्षा ऋतु में वातावरण में नमी बढ़ने से पाचन तंत्र अपेक्षाकृत कमजोर हो जाता है। इसी मौसम में बैक्टीरिया और संक्रमण फैलने की संभावना भी अधिक रहती है। इसलिए हल्का भोजन, उबला पानी और ताजा भोजन स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है। वहीं तली-भुनी और बासी चीजों से परहेज करने की सलाह दी जाती है।
चातुर्मास में आएंगे कई प्रमुख धार्मिक पर्व
भले ही इस अवधि में मांगलिक कार्य स्थगित रहते हों, लेकिन धार्मिक दृष्टि से यह समय अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। चातुर्मास के दौरान कई बड़े पर्व और उत्सव मनाए जाएंगे, जिनमें प्रमुख हैं-
- 25 जुलाई – देवशयनी एकादशी (चातुर्मास प्रारंभ)
- 29 जुलाई – गुरु पूर्णिमा
- 30 जुलाई – सावन मास प्रारंभ
- 28 अगस्त – रक्षाबंधन
- 4 सितंबर – श्रीकृष्ण जन्माष्टमी
- 14 सितंबर – गणेश चतुर्थी
- 11 अक्टूबर – शारदीय नवरात्र प्रारंभ
- 20 अक्टूबर – विजयादशमी (दशहरा)
- 25 अक्टूबर – शरद पूर्णिमा
- 8 नवंबर– दीपावली
- 20 नवंबर – देवउठनी एकादशी (चातुर्मास समाप्त)
आध्यात्मिक साधना का सर्वोत्तम समय
धार्मिक ग्रंथों में चातुर्मास को आत्मचिंतन, भक्ति और आध्यात्मिक उन्नति का विशेष काल माना गया है। इस दौरान व्रत, पूजा, दान, जप और सत्संग का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। मान्यता है कि इन चार महीनों में श्रद्धा और नियमपूर्वक भगवान विष्णु तथा भगवान शिव की उपासना करने से विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है और जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है।