प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऑस्ट्रेलिया दौरे के दौरान भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण समझौता हुआ है। इस समझौते के तहत ऑस्ट्रेलिया भारत को शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए यूरेनियम की आपूर्ति करेगा। इसे भारत की ऊर्जा सुरक्षा और स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों की दिशा में एक बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि माना जा रहा है।
भारत में बढ़ती आबादी और तेजी से बढ़ती बिजली की मांग को देखते हुए परमाणु ऊर्जा की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। ऐसे में यूरेनियम की नियमित आपूर्ति भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को नई गति दे सकती है। दूसरी ओर, ऑस्ट्रेलिया दुनिया के सबसे बड़े यूरेनियम भंडार वाले देशों में शामिल है और उसके पास वैश्विक यूरेनियम भंडार का लगभग 28 प्रतिशत हिस्सा मौजूद है।
संयुक्त बयान में क्या कहा गया?
भारत और ऑस्ट्रेलिया की ओर से जारी संयुक्त बयान में कहा गया कि यूरेनियम की आपूर्ति अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के सुरक्षा मानकों के अनुरूप केवल शांतिपूर्ण और नागरिक परमाणु कार्यक्रमों के लिए की जाएगी। दोनों देशों ने इस सहयोग को दीर्घकालिक और भरोसेमंद साझेदारी की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है।
भारत के स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्य को मिलेगा बल
भारत वर्ष 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता विकसित करने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए यूरेनियम की पर्याप्त उपलब्धता बेहद आवश्यक है। वर्तमान में देश के कुल बिजली उत्पादन में परमाणु ऊर्जा की हिस्सेदारी लगभग 3 प्रतिशत है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस समझौते से भारत के स्वच्छ ऊर्जा कार्यक्रम को मजबूती मिलेगी और भविष्य में करोड़ों घरों तक बिजली पहुंचाने में मदद मिलेगी।
परमाणु परीक्षण के बाद बदले थे हालात
भारत ने वर्ष 1974 और फिर 1998 में परमाणु परीक्षण किए थे। इसके बाद लंबे समय तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तकनीकी प्रतिबंध और यूरेनियम व्यापार पर कई सीमाएं लागू रहीं। हालांकि वर्ष 2008 में न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (NSG) से विशेष छूट मिलने के बाद भारत के लिए वैश्विक परमाणु ईंधन बाजार के रास्ते खुले। अब ऑस्ट्रेलिया के साथ हुआ यह समझौता उसी प्रक्रिया को और मजबूत करने वाला माना जा रहा है।
स्पेस सेक्टर में भी बढ़ेगा सहयोग
ऊर्जा सहयोग के अलावा भारत और ऑस्ट्रेलिया ने अंतरिक्ष क्षेत्र में भी साझेदारी बढ़ाने पर सहमति जताई है। दोनों देश हिंद महासागर में स्थित ऑस्ट्रेलिया के कोकोस (कीलिंग) द्वीप पर एक अस्थायी स्पेस ट्रैकिंग टर्मिनल विकसित करेंगे। इससे भारत के अंतरिक्ष मिशनों और भविष्य की स्पेस परियोजनाओं को तकनीकी सहायता मिलेगी।
एनपीटी के बावजूद बढ़ा सहयोग
ऑस्ट्रेलिया परमाणु अप्रसार संधि (NPT) का हस्ताक्षरकर्ता देश है, जबकि भारत इस संधि का हिस्सा नहीं है। भारत लंबे समय से इस संधि को भेदभावपूर्ण मानता रहा है, क्योंकि इसमें केवल 1967 से पहले परमाणु परीक्षण करने वाले देशों को ही परमाणु हथियार संपन्न राष्ट्र का दर्जा दिया गया है। इसके बावजूद दोनों देशों के बीच यूरेनियम आपूर्ति पर सहमति बनना भारत की कूटनीतिक सफलता के रूप में देखा जा रहा है।
क्या बोले दोनों देशों के नेता?
ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने कहा कि यह समझौता भारत को ऑस्ट्रेलियाई यूरेनियम की आपूर्ति का मार्ग आसान बनाएगा और स्वच्छ ऊर्जा क्षमता के विस्तार में मदद करेगा। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे दोनों देशों के संबंधों में ऐतिहासिक उपलब्धि बताते हुए कहा कि इस समझौते से भारत के क्लीन एनर्जी मिशन को नई गति मिलेगी और ऊर्जा सुरक्षा को भी मजबूती मिलेगी।