सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (16 अप्रैल 2026) को पश्चिम बंगाल में 1,000 से अधिक प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों के तबादलों को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया। यह तबादले चुनाव आयोग की ओर से किए गए थे, जिन्हें कलकत्ता हाईकोर्ट द्वारा भी पहले खारिज किया जा चुका था। इसके बाद याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था, लेकिन अदालत ने हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।
कोर्ट ने महत्वपूर्ण सवाल को भविष्य के लिए खुला छोड़ा
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने कहा कि यह मामला एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न उठाता है कि क्या चुनाव आयोग को किसी भी चुनावी राज्य में प्रशासनिक बदलाव करने से पहले राज्य सरकार से परामर्श करना चाहिए या नहीं। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस प्रश्न पर अंतिम निर्णय किसी उपयुक्त मामले में लिया जाएगा और इसे फिलहाल खुला रखा गया है।
राज्य और चुनाव आयोग के बीच भरोसे की कमी पर टिप्पणी
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी कहा कि देश में अखिल भारतीय सेवाओं के मूल उद्देश्य को नुकसान पहुंच रहा है। सीजेआई सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति करनी पड़ी, क्योंकि राज्य सरकार और चुनाव आयोग के बीच भरोसे की कमी दिखाई दी।
याचिकाकर्ता और वकील की दलील
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने तर्क दिया कि चुनाव अधिसूचना के बाद लगभग 1,100 अधिकारियों का रातोंरात तबादला किया गया, जो पहली बार हुआ है। उन्होंने यह भी कहा कि मुख्य सचिव जैसे वरिष्ठ पदाधिकारी का भी तबादला किया गया, जो एक गंभीर मुद्दा है। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि ऐसे कदम पहले भी अन्य राज्यों में उठाए जा चुके हैं।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और फैसला
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सभी बदले गए अधिकारी पश्चिम बंगाल कैडर के ही हैं और यह कोई नई या अनोखी स्थिति नहीं है। बेंच ने कहा कि चुनाव आयोग द्वारा अन्य राज्यों से पर्यवेक्षकों की नियुक्ति भी सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है। अंत में सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि इस विषय पर कानून का प्रश्न भविष्य में उचित मामले में तय किया जाएगा।