प्रयागराज: उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अंतरधार्मिक जोड़ों (Interfaith Couples) के हक में एक बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ तौर पर कहा है कि अगर दो अलग-अलग धर्मों के बालिग व्यक्ति अपनी मर्जी से एक साथ रहना चाहते हैं, जिसे हम लिव इन रिलेशनशिप कहते हैं, तो यह कोई अपराध नहीं है। कोर्ट का यह फैसला उन जोड़ों के लिए एक बहुत बड़ी राहत लेकर आया है जो समाज या परिवार के डर से असुरक्षित महसूस करते हैं।
न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह ने एक हिंदू लड़की और एक मुस्लिम युवक की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। इस जोड़े ने कोर्ट से गुहार लगाई थी कि वे अपनी मर्जी से साथ रह रहे हैं, लेकिन उन्हें कुछ लोगों से अपनी जान और आजादी का खतरा है। उन्होंने अदालत से मांग की थी कि पुलिस और प्रशासन को उन्हें सुरक्षा देने का निर्देश दिया जाए। कोर्ट ने उनकी इस मांग को जायज माना और उनके पक्ष में फैसला सुनाया।
अदालत ने अपने फैसले में भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का विस्तार से जिक्र किया। कोर्ट ने कहा कि हमारा संविधान हर नागरिक को बराबरी का हक देता है। अनुच्छेद 21 के तहत हर व्यक्ति को अपने जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करने का मौलिक अधिकार प्राप्त है। इसका सीधा मतलब यह है कि एक बार जब कोई लड़का या लड़की बालिग हो जाता है, तो वह यह फैसला करने के लिए स्वतंत्र है कि वह किसके साथ रहना चाहता है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चाहे शादी हुई हो या न हुई हो, किसी भी व्यक्ति की पसंद में दखल देना कानूनन गलत है। जाति, धर्म, लिंग या पंथ के आधार पर किसी भी नागरिक के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट पहले भी कई बार कह चुके हैं कि लिव इन रिलेशनशिप में रहना न तो कानूनन मना है और न ही इसके लिए किसी सजा का प्रावधान है।
सुनवाई के दौरान सरकार की तरफ से अदालत को बताया गया कि याचिका दाखिल करने वाले दोनों ही लोग बालिग हैं। उनके खिलाफ किसी भी तरह की कोई एफआईआर (FIR) दर्ज नहीं है और न ही उन्होंने कोई अपराध किया है। इस पर हाई कोर्ट ने कहा कि जब इन लोगों ने कोई जुर्म नहीं किया है, तो कोर्ट को ऐसा कोई कारण नजर नहीं आता कि उन्हें सुरक्षा न दी जाए।
अदालत ने पुलिस अधिकारियों को कड़े निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि अगर इन लोगों को कोई नुकसान पहुंचाने की कोशिश करता है या जबरन इनका धर्म परिवर्तन कराने का प्रयास करता है, तो ये सीधे पुलिस के पास शिकायत दर्ज करा सकते हैं। ऐसी स्थिति में पुलिस को तुरंत जांच करनी होगी और उनकी जान-माल की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाने होंगे। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि बालिग होने के बाद किसी की मर्जी के खिलाफ उसे मजबूर करना मौलिक अधिकारों का हनन है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला समाज के उस हिस्से के लिए एक बड़ा संदेश है जो अंतरधार्मिक संबंधों को गलत नजरिए से देखता है। अदालत ने यह साफ कर दिया है कि कानून की नजर में ‘संवैधानिक नैतिकता’ सबसे ऊपर है। समाज की सोच या परंपराएं किसी नागरिक के संवैधानिक अधिकारों को नहीं छीन सकतीं।
इस फैसले से यह भी साफ हो गया है कि प्रशासन को ऐसे मामलों में संवेदनशील होना चाहिए। कोर्ट ने ‘नूरी’ मामले के पुराने आदेशों का हवाला देते हुए कहा कि सभी अधिकारियों को इन नियमों का कड़ाई से पालन करना होगा। यह आदेश केवल इस जोड़े के लिए नहीं, बल्कि उन सभी लोगों के लिए एक उम्मीद की किरण है जो अपनी पसंद के साथी के साथ शांति से जीवन बिताना चाहते हैं।