विरासत में बराबरी की मांग पहुंची सुप्रीम कोर्ट
देश की सर्वोच्च अदालत में एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका दायर की गई है जिसमें मुस्लिम महिलाओं को संपत्ति और विरासत में पुरुषों के बराबर हिस्सेदारी देने की मांग उठाई गई है। इस याचिका में मुस्लिम पर्सनल लॉ के उन प्रावधानों को सीधे चुनौती दी गई है जो महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम विरासत अधिकार देते हैं। यह मामला न केवल कानूनी दृष्टि से बल्कि सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से भी अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण है।
बेंच की अहम टिप्पणी
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस आर महादेवन की तीन सदस्यीय बेंच ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए और टिप्पणियाँ कीं। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि देश की सभी महिलाओं को समान अधिकार सुनिश्चित करने का एक प्रभावी रास्ता यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी UCC भी हो सकता है। यह टिप्पणी इस मामले में बेहद अहम मानी जा रही है क्योंकि यह पहली बार नहीं है जब सर्वोच्च अदालत ने UCC का संदर्भ दिया हो, लेकिन इस संदर्भ में इसका उल्लेख विशेष महत्व रखता है।
जस्टिस बागची ने भी स्पष्ट किया कि संविधान के नीति निदेशक तत्वों के अंतर्गत UCC लागू करना विधायिका का क्षेत्र है और इस पर अंतिम निर्णय संसद को ही करना होगा। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यह एक नीतिगत और विधायी मसला है, जिसमें न्यायपालिका की भूमिका सीमित है।
पर्सनल लॉ की संवैधानिक जाँच का सवाल
बेंच ने याचिकाकर्ता के वकील प्रशांत भूषण से एक महत्वपूर्ण सवाल पूछा कि क्या अदालत मुस्लिम पर्सनल लॉ की संवैधानिक वैधता की जाँच कर सकती है? जस्टिस बागची ने एक पुराने फैसले का हवाला देते हुए कहा कि उस निर्णय में माना गया था कि पर्सनल लॉ को संविधान की कसौटी पर नहीं परखा जा सकता। यह सवाल इस पूरे मामले की सबसे बड़ी कानूनी चुनौती है।
कानूनी शून्य की चिंता
बेंच ने एक और महत्वपूर्ण चिंता जताई। अदालत ने पूछा कि यदि शरीयत के उत्तराधिकार नियमों को रद्द कर दिया जाए तो उसकी जगह कौन सा कानून लागू होगा क्योंकि मुस्लिम उत्तराधिकार को नियंत्रित करने वाला कोई अलग वैधानिक कानून फिलहाल मौजूद नहीं है। मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि सुधार की जल्दबाजी में कहीं ऐसा न हो कि मुस्लिम महिलाएं अपने मौजूदा अधिकारों से भी वंचित हो जाएँ।
वकील की दलील
इस पर प्रशांत भूषण ने तर्क दिया कि यदि शरीयत के प्रावधान हटाए जाते हैं तो भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925 स्वतः लागू हो सकता है। उन्होंने कहा कि विरासत का अधिकार एक नागरिक अधिकार है और इसे अनुच्छेद 25 के तहत आवश्यक धार्मिक प्रथा नहीं माना जा सकता। उन्होंने ट्रिपल तलाक फैसले का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस तरह तीन तलाक को असंवैधानिक ठहराया गया था, उसी तर्ज पर यहाँ भी निर्णय संभव है।
आगे की सुनवाई
अदालत ने सुझाव दिया कि याचिका में यह स्पष्ट किया जाए कि शरीयत प्रावधान हटने की स्थिति में वैकल्पिक कानूनी व्यवस्था क्या होगी। प्रशांत भूषण के याचिका संशोधित करने पर सहमत होने के बाद अदालत ने मामले की सुनवाई अगली तारीख तक के लिए स्थगित कर दी। यह मामला आने वाले समय में देश के पारिवारिक कानून और महिला अधिकारों की दिशा तय करने में मील का पत्थर साबित हो सकता है।