क्या फिर लौटेगा 1970 का तेल संकट? ईरान युद्ध के बाद कच्चा तेल 100 डॉलर पार, इतिहास से खींची जा रही खतरनाक तुलना

Vin News Network
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ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध के 10वें दिन ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर पार कर गया। होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने की आशंका से वैश्विक ऊर्जा बाजार में 1970 जैसे संकट की चेतावनी दी जा रही है।

नई दिल्ली, मार्च 2026 ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच युद्ध के 10वें दिन वैश्विक तेल बाजार में जो उथल-पुथल मची है, उसने दुनिया को 1970 के दशक की उस भयावह याद दिला दी है जब कच्चे तेल की कीमतें रातोरात 300 प्रतिशत उछल गई थीं। ब्रेंट क्रूड ऑयल करीब 29 प्रतिशत की छलांग लगाकर 100 डॉलर प्रति बैरल का आंकड़ा पार कर गया है। होर्मुज जलडमरूमध्य में शिपिंग बाधित होने की आशंका ने इस संकट को और गहरा कर दिया है।

1973 का वो तेल संकट जिसने बदल दी थी दुनिया
मौजूदा हालात की तुलना 1973 के अरब-इजरायल युद्ध से की जा रही है। उस समय OPEC के अरब सदस्य देशों ने इजरायल का समर्थन करने वाले देशों अमेरिका, नीदरलैंड, पुर्तगाल और दक्षिण अफ्रीका पर तेल प्रतिबंध लगा दिया था। यह फैसला रिचर्ड निक्सन प्रशासन द्वारा इजरायल को सैन्य सहायता देने के जवाब में लिया गया था।

इस प्रतिबंध का असर जबरदस्त था। कच्चे तेल की कीमतें करीब 3 डॉलर प्रति बैरल से उछलकर 12 डॉलर तक पहुंच गईं यानी 300 प्रतिशत की बढ़ोतरी। वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 7 से 9 प्रतिशत हिस्सा अचानक बाजार से गायब हो गया था। इसे आधुनिक इतिहास का सबसे भीषण तेल संकट माना जाता है। इसके कुछ साल बाद ईरानी क्रांति के कारण ईरान का तेल उत्पादन बाधित हुआ और कीमतें फिर करीब 180 प्रतिशत उछल गईं।

होर्मुज दुनिया का सबसे संवेदनशील ऊर्जा गलियारा
Equirus Securities की एक रिपोर्ट के अनुसार ईरान का महत्व केवल उसके तेल उत्पादन तक सीमित नहीं है। वैश्विक आपूर्ति में उसकी हिस्सेदारी भले ही अपेक्षाकृत कम हो, लेकिन उसकी भौगोलिक स्थिति उसे असाधारण ताकत देती है। होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया की करीब 20 प्रतिशत तेल आपूर्ति और इतना ही LNG व्यापार गुजरता है। यह सऊदी अरब, इराक, कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात के कच्चे तेल का मुख्य निर्यात मार्ग है। इसीलिए इस क्षेत्र में तनाव बढ़ते ही बिना किसी तत्काल आपूर्ति नुकसान के भी तेल बाजार तेजी से ऊपर चला जाता है।

100 डॉलर का आंकड़ा फिर टूटा
युद्ध के बढ़ते असर के बीच ब्रेंट क्रूड 119.46 डॉलर प्रति बैरल और वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट यानी WTI क्रूड भी करीब 119.43 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। यह 2022 के यूक्रेन संकट के बाद पहली बार है जब वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर से ऊपर गई हैं।

होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों पर हमलों के बाद यह रास्ता सामान्य टैंकर यातायात के लिए प्रभावी रूप से बंद हो गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने यह दावा जरूर किया है कि जलडमरूमध्य खुला है और वहां से गुजरने वाले जहाजों के लिए बीमा की पेशकश भी की है, लेकिन बाजार इस आश्वासन से आश्वस्त नहीं दिखता।

सिर्फ कीमत नहीं, आपूर्ति का भी संकट
Kotak Securities के कमोडिटी और करेंसी रिसर्च प्रमुख अनिंद्य बनर्जी के अनुसार यह उछाल केवल सट्टेबाजी पर आधारित नहीं है। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ तेल की कीमतों का नहीं बल्कि तेल की मात्रा का भी संकट है। उन्होंने इसकी तुलना सीधे 1970 के दशक के उन तेल संकटों से की जब वास्तविक आपूर्ति बाधित होने से कीमतों में ढांचागत उछाल आया था।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर होर्मुज जलडमरूमध्य लंबे समय तक बाधित रहा तो यह संकट 1973 से भी बड़ा साबित हो सकता है। भारत जैसे देशों के लिए जो अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से पूरा करते हैं, यह स्थिति महंगाई, व्यापार घाटे और आर्थिक स्थिरता के लिए एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है।

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