पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले वोटर लिस्ट को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है। विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के तहत वोटर लिस्ट से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने के बाद कई सीटों का चुनावी गणित बदलता नजर आ रहा है। खासतौर पर वे सीटें जहां पिछले चुनाव में जीत-हार का अंतर महज कुछ सौ वोटों का था, वहां इस बार स्थिति और भी पेचीदा हो सकती है।
65 लाख से ज्यादा नाम हटाए गए
जानकारी के मुताबिक ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से पहले ही करीब 58 लाख नाम हटाए जा चुके थे। अब फाइनल लिस्ट में भी 7 लाख से ज्यादा नाम और हटाए गए हैं। यानी कुल मिलाकर 65 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से बाहर हो चुके हैं। इसके अलावा करीब 60 लाख से ज्यादा नाम अभी भी पेंडिंग बताए जा रहे हैं, जिन पर न्यायिक अधिकारियों को दस्तावेजों की जांच के बाद अंतिम फैसला लेना है।
कम अंतर वाली सीटों पर सबसे ज्यादा असर
बंगाल में कई ऐसी सीटें हैं जहां पिछली बार 500 से 1000 वोटों के बेहद कम अंतर से जीत-हार हुई थी। ऐसे में हजारों नामों का हटना सीधे तौर पर इन सीटों के नतीजों को प्रभावित कर सकता है।
बलरामपुर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यहां 2021 में BJP के बानेश्वर महतो ने TMC के शांतिराम महतो को महज 423 वोटों के अंतर से हराया था। लेकिन अब इस सीट पर वोटर लिस्ट से 19 हजार से ज्यादा नाम हटाए गए हैं। यह संख्या जीत के अंतर से कई गुना ज्यादा है, जो इस सीट के चुनावी समीकरण को पूरी तरह बदल सकती है।
इसी तरह दंतान में TMC के बिक्रम चंद्र प्रधान ने 2021 में BJP को महज 623 वोटों से हराया था। यहां से लगभग 10 हजार नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं। बिक्रम चंद्र प्रधान 2011, 2016 और 2021 में लगातार तीन बार इस सीट से विधायक चुने गए हैं। इसके अलावा कुल्टी, तमलुक और जलपाईगुड़ी जैसी सीटों पर भी हजारों नाम हटाए जाने की खबरें आ रही हैं।
BJP और TMC के अलग-अलग दावे
इस पूरे मामले पर BJP और TMC आमने-सामने हैं। BJP का दावा है कि वोटर लिस्ट से फर्जी और घुसपैठियों के नाम हटाए गए हैं, जिससे चुनाव निष्पक्ष और पारदर्शी होगा। पार्टी इसे लोकतंत्र की मजबूती बता रही है।
वहीं TMC केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगा रही है। TMC का कहना है कि जानबूझकर असली वोटरों के नाम काटे जा रहे हैं और यह लोकतांत्रिक अधिकारों पर सीधा हमला है। दोनों पार्टियां अपने-अपने हिसाब से आंकड़ों का विश्लेषण कर रही हैं और इसे अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश में लगी हैं।
60 लाख पेंडिंग नाम असली फैसला अभी बाकी
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जो 60 लाख से ज्यादा नाम अभी पेंडिंग हैं, उनमें से कितने सप्लीमेंट्री लिस्ट में वापस शामिल होंगे। न्यायिक अधिकारियों को दस्तावेजों की जांच के बाद यह अंतिम फैसला लेना है। अगर बड़ी संख्या में नाम वापस जुड़ते हैं तो चुनावी तस्वीर अलग होगी, लेकिन अगर नहीं जुड़ते तो कई सीटों पर पूरा गणित पलट सकता है।
इस बार बंगाल चुनाव में सिर्फ रैलियां और प्रचार ही नहीं, बल्कि वोटर लिस्ट भी सबसे बड़ा और निर्णायक मुद्दा बनने वाली है।