ऑनलाइन दुनिया में बच्चों की सुरक्षा को लेकर एक गंभीर रिपोर्ट सामने आई है। ऑस्ट्रेलिया में इंटरनेट सुरक्षा पर नजर रखने वाली एक स्वतंत्र संस्था ‘ई-सेफ्टी कमिश्नर’ ने बुधवार को एक चौंकाने वाली रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि यूट्यूब, एप्पल और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर बच्चों से जुड़ी यौन शोषण वाली सामग्री उपलब्ध है और इन प्लेटफॉर्म्स ने बार-बार शिकायतों के बावजूद कोई ठोस कदम नहीं उठाया।
मुख्य रिपोर्ट में क्या कहा गया?
ई-सेफ्टी कमिश्नर जूली इनमैन ग्रांट ने रिपोर्ट में बताया कि बाल यौन शोषण से जुड़े कंटेंट को लेकर यूट्यूब और एप्पल को कई बार शिकायतें भेजी गईं, लेकिन कंपनियों ने या तो जवाब नहीं दिया या फिर बहुत ही धीमी और गैर-जिम्मेदार प्रतिक्रिया दी।
रिपोर्ट के अनुसार, यूट्यूब पर मौजूद कुछ वीडियो को “अनुचित सुझाव” के तहत पहचाना गया था, जहां एल्गोरिद्म बच्चों से संबंधित सामग्री की आड़ में आपत्तिजनक वीडियो को प्रमोट कर रहा था।
कंपनियों की चुप्पी बनी चिंता का विषय
रिपोर्ट के सबसे चिंता जनक हिस्सों में से एक यह है कि यूट्यूब और एप्पल जैसे वैश्विक तकनीकी दिग्गजों ने इन गंभीर मुद्दों पर किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देना उचित नहीं समझा। यह निष्क्रियता बाल सुरक्षा के लिहाज से खतरनाक मानी जा रही है।रिपोर्ट में विशेष रूप से कहा गया: “हमने यूट्यूब और एप्पल को कई बार औपचारिक रूप से लिखा, लेकिन उन्होंने या तो जवाब देने से इनकार किया या फिर बहुत बाद में आधा-अधूरा उत्तर भेजा। यह लापरवाही एक गंभीर वैश्विक संकट का संकेत है।” – ई-सेफ्टी कमिश्नर।
कैसे होती है ये आपत्तिजनक सामग्री वायरल?
ऑस्ट्रेलिया की साइबर सिक्योरिटी फर्म के अनुसार, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर मौजूद एल्गोरिदम और सुझाव प्रणाली, बच्चों की वीडियो या कंटेंट देखने की आदतों का फायदा उठाते हुए ऐसे कंटेंट को प्रमोट कर रही हैं, जो धीरे-धीरे बाल यौन शोषण से जुड़ी सामग्री की तरफ ले जाती हैं। रिपोर्ट में यूट्यूब पर ‘असामान्य टिप्पणियां’ और ‘लंबे समय तक दिखाए जाने वाले फुटेज’ को भी संदिग्ध बताया गया है, जिनका विश्लेषण करने पर यौन शोषण के संकेत मिलते हैं।
ऑस्ट्रेलिया की कार्रवाई और वैश्विक प्रभाव
इस रिपोर्ट के बाद ऑस्ट्रेलियाई सरकार और साइबर सुरक्षा एजेंसियों ने कड़ा रुख अपनाने का संकेत दिया है। उन्होंने कहा है कि अब यह केवल स्थानीय मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह एक वैश्विक आपदा है, जिस पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग के साथ तत्काल कदम उठाने की जरूरत है। इस विषय को संयुक्त राष्ट्र (UN) और इंटरपोल तक ले जाने की भी तैयारी की जा रही है ताकि बड़ी टेक कंपनियों पर वैश्विक दबाव बनाया जा सके।
यूट्यूब की सफाई या चुप्पी?
अब तक यूट्यूब या उसकी पैरेंट कंपनी गूगल (Google) की तरफ से इस रिपोर्ट को लेकर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। हालांकि, अतीत में गूगल ने कहा था कि वह “बच्चों की सुरक्षा को सर्वोपरि मानते हैं” और इसके लिए वे अपने एल्गोरिद्म और रिपोर्टिंग सिस्टम में निरंतर सुधार कर रहे हैं। लेकिन मौजूदा रिपोर्ट कहती है कि यह दावा धरातल पर उतना मजबूत नहीं है, जितना प्रचारित किया गया है।
एप्पल की भूमिका पर भी सवाल
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि एप्पल के ऐप स्टोर पर भी कुछ ऐसे ऐप्स मौजूद हैं जो बच्चों से संबंधित संवेदनशील डाटा इकट्ठा करते हैं और उनमें से कुछ पर आपत्तिजनक सामग्री को प्रसारित करने के आरोप लगे हैं। ई-सेफ्टी कमिश्नर ने एप्पल को नोटिस भेजा था, लेकिन उन्होंने भी कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दिया।
विशेषज्ञों की राय
साइबर लॉ एक्सपर्ट विशाल खन्ना कहते हैं, “यह रिपोर्ट एक आईने की तरह है, जो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की असली जिम्मेदारी को उजागर करती है। बच्चों की सुरक्षा के लिए केवल तकनीकी दावा काफी नहीं है, इसके लिए ठोस नीतियों और सख्त निगरानी की जरूरत है।” ऑस्ट्रेलिया की रिपोर्ट ने एक बार फिर बच्चों की डिजिटल सुरक्षा को वैश्विक विमर्श में ला खड़ा किया है। यूट्यूब और एप्पल जैसी कंपनियों की चुप्पी और लापरवाही यह दर्शाती है कि अब तकनीकी दिग्गजों को जवाबदेह बनाने के लिए वैश्विक कानून और दबाव की जरूरत है।