लिव-इन रिश्तों में महिलाओं को ‘पत्नी’ का दर्जा मिलना चाहिए, ताकि सुरक्षा सुनिश्चित हो: मदुरै अदालत

Vin News Network
Vin News Network
4 Min Read
न्यायमूर्ति एस. श्रीमती ने कहा कि लिव-इन रिश्तों में महिलाओं को गंधर्व विवाह के तहत ‘पत्नी’ का दर्जा देकर सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए।

तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली जिले में मदुरै बेंच, मद्रास उच्च न्यायालय ने हाल ही में कहा कि लिव-इन रिश्तों में रह रही महिलाओं को प्राचीन ‘गंधर्व विवाह’ की संकल्पना के तहत पत्नी का दर्जा दिया जाना चाहिए, ताकि उनकी सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

यह टिप्पणी अदालत ने तब दी जब उसने एक व्यक्ति की अग्रिम जमानत याचिका खारिज की थी। यह व्यक्ति मणप्पराई ऑल वूमन पुलिस स्टेशन द्वारा गिरफ्तार किया गया था। उसके खिलाफ आरोप था कि उसने शादी का झूठा वादा करके महिला के साथ शारीरिक संबंध बनाए। मामला लिव-इन रिश्तों में धोखे और वादाखिलाफी के माध्यम से महिलाओं के शोषण से जुड़ा था।

अदालत ने इस महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दे पर ध्यान केंद्रित करते हुए कहा कि आधुनिक सामाजिक ढांचे में अदालतों की जिम्मेदारी है कि वे कमजोर महिलाओं की सुरक्षा करें। क्योंकि लिव-इन रिश्तों में महिलाओं को वही कानूनी सुरक्षा नहीं मिलती जो शादीशुदा महिलाओं को मिलती है।

अदालत के शब्दों में:
“लिव-इन रिश्ते में महिलाओं को गंधर्व विवाह या प्रेम विवाह के तहत ‘पत्नी’ का दर्जा देकर सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए। ताकि यदि लिव-इन रिश्ता तनावपूर्ण हो भी जाए, महिलाओं को पत्नी के रूप में कानूनी अधिकार मिल सकें।” – न्यायमूर्ति एस. श्रीमती

मामला क्या था

एक व्यक्ति, जो महिला के साथ लिव-इन संबंध में था, मणप्पराई ऑल वूमन पुलिस स्टेशन द्वारा गिरफ्तार किया गया। अभियोजन के अनुसार, उसने शादी का वादा करके महिला के साथ कई बार शारीरिक संबंध बनाए, लेकिन बाद में यह वादा निभाया नहीं।

आरोपी ने अग्रिम जमानत की याचिका दायर की, लेकिन अदालत ने इसे खारिज कर दिया। अदालत ने प्रारंभिक रूप से आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 के तहत मामला दर्ज किया। यह धारा शादी का झूठा वादा करके किए गए शारीरिक संबंधों को अपराध मानती है।

कानूनी ‘ग्रे एरिया’ का शोषण रोकने का प्रयास

न्यायमूर्ति श्रीमती ने कहा कि आधुनिकता का हवाला देते हुए कई पुरुष इस कानूनी अस्पष्टता का फायदा उठाते हैं, और जब रिश्ता टूटता है, तो महिला के चरित्र पर सवाल उठाते हैं।

“पुरुष खुद को आधुनिक मान सकते हैं, लेकिन जैसे ही संबंध बिगड़ता है, वे तुरंत महिलाओं को शर्मिंदा करने या दोषारोपण करने लगते हैं।”

अदालत ने यह भी नोट किया कि भारत में लिव-इन संबंध अभी भी सांस्कृतिक दृष्टि से चुनौतीपूर्ण माने जाते हैं, लेकिन युवा महिलाओं के बीच यह आम हो गया है। कई महिलाएं आधुनिक जीवनशैली अपनाने के उद्देश्य से लिव-इन संबंध में आती हैं, लेकिन बाद में निराश होती हैं क्योंकि कानून उन्हें शादीशुदा महिलाओं जैसी सुरक्षा नहीं देता।

“लड़कियां सोचती हैं कि वे आधुनिक हैं और लिव-इन संबंध चुनती हैं। लेकिन कुछ समय बाद जब उन्हें एहसास होता है कि लिव-इन में शादी जैसी सुरक्षा नहीं मिल रही, तो यह वास्तविकता उनके लिए गंभीर परेशानी बन जाती है।” – अदालत ने Livelaw के हवाले से कहा।

कानून का सख्त संदेश

न्यायमूर्ति श्रीमती ने स्पष्ट किया कि जो पुरुष आधुनिकता के नाम पर वादे तोड़ते हैं, वे कानूनी कार्रवाई से बच नहीं सकते। उन्होंने कहा, “यदि विवाह संभव नहीं है, तो पुरुषों को कानून की ताकत का सामना करना होगा।”

वर्तमान में, धारा 69 BNS महिलाओं की इस प्रकार की स्थितियों में सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक महत्वपूर्ण प्रावधान के रूप में काम करती है।

अदालत की यह टिप्पणी लिव-इन संबंधों में महिलाओं के अधिकार और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के दृष्टिकोण से मील का पत्थर मानी जा रही है। यह निर्णय कानूनी और सामाजिक दोनों स्तर पर संदेश देता है कि महिलाओं को धोखे और वादाखिलाफी के खिलाफ सुरक्षा देने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे।

Share This Article
Leave a Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *