भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहां करोड़ों किसान अपनी आजीविका के लिए खेती पर निर्भर हैं और कृषि देश की GDP में लगभग 18% योगदान देती है। लेकिन बदलती जलवायु, अनियमित मौसम और पर्यावरणीय दबावों ने भारतीय कृषि को चुनौतीपूर्ण बना दिया है। इसलिए जलवायु-प्रतिरोधी कृषि (Climate-Resilient Agriculture) अब जरूरी हो गई है।
जलवायु परिवर्तन का सीधा असर
भारत में जलवायु परिवर्तन की वजह से खेती पर कई नकारात्मक प्रभाव दिखाई दे रहे हैं:
- अनियमित वर्षा: मानसून का समय बदल रहा है, जिससे कुछ जगहों पर बाढ़ और कुछ जगहों पर सूखा पड़ता है।
- बढ़ते तापमान: गर्मी की तीव्रता फसलों की पैदावार पर असर डाल रही है, खासकर गेहूं, धान और दालों में।
- अत्यधिक मौसमी घटनाएँ: चक्रवात, ओलावृष्टि और असामयिक बारिश फसलों को नुकसान पहुंचाती हैं।
- जल संकट: सिंचाई के लिए भूजल का अत्यधिक उपयोग और बदलते वर्षा पैटर्न ने पानी की उपलब्धता को प्रभावित किया है।
अध्ययनों के अनुसार, यदि हम तुरंत उपाय नहीं करेंगे, तो आने वाले दशकों में भारत की प्रमुख फसलों जैसे गेहूं और धान की पैदावार 10-25% तक घट सकती है।
खाद्य सुरक्षा और किसानों की आय पर असर
कृषि ही भारत में भोजन सुरक्षा का आधार है। यदि जलवायु परिवर्तन के असर को नजरअंदाज किया गया, तो:
- अनाज, दाल और सब्जियों की कमी हो सकती है।
- खाद्य कीमतें बढ़ सकती हैं।
- आयात पर निर्भरता बढ़ सकती है।
छोटे किसान विशेष रूप से संवेदनशील हैं क्योंकि उनकी आजीविका सीधे फसल पर निर्भर करती है। किसी भी फसल की बर्बादी उनके लिए कर्ज और आर्थिक संकट ला सकती है।
जलवायु-प्रतिरोधी कृषि क्या है?
जलवायु-प्रतिरोधी कृषि का मतलब है ऐसी खेती जो जलवायु के जोखिमों का सामना कर सके और स्थिर उत्पादन दे सके। इसमें शामिल हैं:
- सूखा और बाढ़ सहनशील फसलें
- सिंचाई की आधुनिक तकनीकें जैसे ड्रिप और स्प्रिंकलर
- कृषि विविधीकरण और एग्रोफॉरेस्ट्री
- मृदा संरक्षण और जैविक खेती
- अत्यधिक मौसम की चेतावनी प्रणाली
ये तरीके न केवल फसलों की सुरक्षा करते हैं, बल्कि पर्यावरणीय दबाव को भी कम करते हैं।
भारत के लिए तत्काल आवश्यकता
भारत की कृषि जलवायु-संवेदनशील है। इसलिए जलवायु-प्रतिरोधी कृषि को अपनाना जरूरी है ताकि:
- बाढ़, सूखा और गर्मी जैसी घटनाओं से फसलें सुरक्षित रहें।
- जल और मृदा संसाधनों का सतत उपयोग सुनिश्चित हो।
- किसानों की आजीविका स्थिर बनी रहे।
- भारत वैश्विक खाद्य सुरक्षा में अपनी स्थिति बनाए रख सके।
सरकार ने इसके लिए कई योजनाएं शुरू की हैं जैसे प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) और राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (NMSA), जो किसानों को प्रशिक्षण, तकनीक और संसाधन उपलब्ध कराते हैं।
जलवायु-प्रतिरोधी कृषि अपनाना भारत के लिए अब विकल्प नहीं बल्कि आवश्यकता बन चुका है। इससे न केवल किसानों की सुरक्षा और उत्पादन स्थिरता सुनिश्चित होगी, बल्कि भारत की खाद्य सुरक्षा और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा भी होगी। अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से खेती और किसान दोनों संकट में पड़ सकते हैं।