नई दिल्ली। सोशल मीडिया पर इन दिनों एक चौंकाने वाला दावा वायरल हो रहा है जिसमें कहा गया है कि – वैज्ञानिकों ने पाया है कि मोबाइल फोन से निकलने वाला रेडिएशन सिर्फ 30 दिनों में मस्तिष्क की कोशिकाओं को इतना नुकसान पहुंचाता है कि वो माइक्रोस्कोप से साफ दिखाई देने लगती हैं।
इस पोस्ट को लाखों लोगों ने शेयर किया है और तमाम यूजर्स इसे सच मान बैठे हैं। लेकिन जब हमने इसकी साइंटिफिक पड़ताल की, तो सामने आई एक अलग ही सच्चाई।
क्या सच में रेडिएशन से होता है दिमाग खराब?
फोन से निकलने वाला रेडिएशन “रेडियो फ्रिक्वेंसी (RF) नॉन-आयोनाइजिंग रेडिएशन” होता है। इसका असर, एक्स-रे या गामा रेडिएशन जैसा खतरनाक नहीं होता।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), भारतीय टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी (TRAI) और अमेरिका की FCC जैसी तमाम एजेंसियों ने ये साफ किया है कि मोबाइल से निकलने वाला रेडिएशन सीमित मात्रा में होता है और वैज्ञानिक तौर पर यह दिमाग की कोशिकाओं को क्षतिग्रस्त करने की क्षमता नहीं रखता।
इस दावे की सच्चाई क्या है?
अब तक के वैज्ञानिक शोधों में मोबाइल फोन से निकलने वाली रेडिएशन के स्वास्थ्य पर असर को लेकर मिली-जुली राय सामने आई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और अमेरिकी नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट (NCI) जैसी संस्थाओं ने स्पष्ट रूप से कहा है कि “मोबाइल फोन से निकलने वाली रेडियो वेव्स ‘नॉन-आयोनाइजिंग रेडिएशन’ होती हैं, जो DNA को सीधा नुकसान नहीं पहुंचाती।”
कुछ सीमित शोधों में लंबे समय तक, उच्च स्तर की रेडिएशन के संपर्क में रहने पर न्यूरल कोशिकाओं पर असर देखा गया है लेकिन यह असर प्रयोगशाला के विशेष हालातों में हुआ है, और इनका मानव पर सीधा प्रमाण नहीं मिला है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण
नॉन-आयोनाइजिंग रेडिएशन में मोबाइल रेडिएशन शामिल है जो त्वचा में ज्यादा अंदर तक नहीं जा पाती। ऊष्मा पैदा कर सकती है, लेकिन मस्तिष्क कोशिकाओं को “प्रत्यक्ष रूप से नष्ट” नहीं करती। ICNIRP (गैर-आयनीकरण विकिरण संरक्षण पर अंतर्राष्ट्रीय आयोग) के अनुसार “मोबाइल रेडिएशन का मस्तिष्क पर गंभीर दीर्घकालिक प्रभाव होने के पक्के प्रमाण नहीं हैं।”
वायरल तस्वीर और उसके पीछे की वास्तविकता
इस वायरल इमेज में जो दावा किया गया है कि “30 दिनों में माइक्रोस्कोप से दिखने लायक डैमेज हो जाता है”। इसका कोई वैज्ञानिक स्रोत या स्टडी लिंक नहीं दिया गया है। यह एक प्रकार का डर फैलाने वाला कंटेंट है।