आज जब हम सुबह उठकर अपने मोबाइल पर खबरें देखते हैं, तो हेडलाइंस डराती हैं। रूस-यूक्रेन का तनाव अभी थमा नहीं था कि मिडिल ईस्ट (मध्य-पूर्व) में इजरायल, ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ती खींचतान ने पूरी दुनिया की नींद उड़ा दी है। हाल ही में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने जो चेतावनी दी है, वह किसी डरावनी फिल्म की पटकथा जैसी लग रही है। आईएमएफ का कहना है कि यह जंग सिर्फ दो देशों की नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की ‘आर्थिक कमर’ तोड़ने वाली साबित हो सकती है।
क्या है आईएमएफ की सबसे बड़ी चिंता?
आईएमएफ की मैनेजिंग डायरेक्टर क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने बड़े स्पष्ट शब्दों में कहा है कि इस युद्ध का नतीजा सिर्फ तबाही नहीं, बल्कि ‘महंगाई का ऐसा चक्र’ होगा जिससे निकलना मुश्किल होगा। जब दुनिया के एक कोने में बम गिरते हैं, तो उसका धुआं दूसरे कोने की रसोई तक पहुँचता है। आईएमएफ के अनुसार, एशिया और यूरोप के वे देश जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर हैं, वे इस आग में सबसे पहले झुलसेंगे।
सीधी बात यह है कि अगर यह तनाव लंबा खिंचता है, तो आर्थिक विकास (Economic Growth) सुस्त पड़ जाएगा और आम आदमी की खरीदने की शक्ति दम तोड़ देगी।
होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz): दुनिया की ‘धड़कन’ पर संकट
इस पूरी जंग में सबसे संवेदनशील जगह है ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’। आपको जानकर हैरानी होगी कि दुनिया का करीब 25 से 30 प्रतिशत कच्चा तेल और 20 प्रतिशत एलएनजी (LNG) इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरता है। यह रास्ता एशिया और यूरोप की ऊर्जा की जीवनरेखा है।
आईएमएफ ने चेतावनी दी है कि अगर युद्ध के कारण यह रास्ता बंद हुआ या यहां जहाजों का आना-जाना प्रभावित हुआ, तो तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी। इसका सबसे बुरा असर उन गरीब देशों पर पड़ेगा जिनके पास विदेशी मुद्रा का भंडार कम है। वे महंगे तेल के लिए अपनी बुनियादी जरूरतों—जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य का बजट काटने को मजबूर हो जाएंगे।
क्या इसमें भारत का भी नाम है?
अक्सर लोग पूछते हैं कि क्या आईएमएफ ने भारत को भी इस खतरे की लिस्ट में रखा है? हालांकि रिपोर्ट में सीधे तौर पर ‘भारत’ का नाम लेकर डराया नहीं गया है, लेकिन “एशिया के बड़े ऊर्जा आयातक” और “बड़े मैन्युफैक्चरिंग हब” जैसे शब्दों का इस्तेमाल भारत की ओर ही इशारा करता है।
भारत अपनी जरूरत का 80% से ज्यादा तेल आयात करता है। अगर वैश्विक बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ते हैं, तो भारत में पेट्रोल-डीजल महंगा होगा। जब डीजल महंगा होता है, तो खेत से मंडी तक सब्जी पहुँचाने का खर्च बढ़ जाता है, जिससे आपकी थाली की महंगाई बढ़ती है। इसके अलावा, आईएमएफ ने ‘हीलियम’ और ‘सल्फर’ जैसी चीजों की कमी की बात भी की है, जो भारत के बढ़ते सेमीकंडक्टर और मेडिकल सेक्टर के लिए झटका साबित हो सकती हैं।
यूरोप और एशिया की अलग-अलग चुनौतियां
आईएमएफ के विश्लेषण में एक दिलचस्प बात सामने आई है। यूरोप में यह संकट 2021-22 जैसी गैस किल्लत पैदा कर सकता है। इटली और ब्रिटेन जैसे देश ज्यादा खतरे में हैं। वहीं दूसरी ओर, फ्रांस और स्पेन जैसे देश थोड़े सुरक्षित हैं क्योंकि उन्होंने परमाणु ऊर्जा और सोलर-विंड एनर्जी पर निवेश किया है।
एशिया के कारखानों में बिजली की लागत बढ़ रही है। जब फैक्ट्री में सामान बनाना महंगा होगा, तो अंत में ग्राहक को ही ज्यादा कीमत चुकानी पड़ेगी। इससे लोगों की बचत कम होगी और आर्थिक मंदी जैसा माहौल बन सकता है।
एक मानवीय दृष्टिकोण: सिर्फ आंकड़े नहीं, जिंदगियां दांव पर हैं
आईएमएफ की इस रिपोर्ट को सिर्फ ‘जीडीपी’ या ‘महंगाई दर’ के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। यह उन करोड़ों लोगों की कहानी है जो पहले से ही महामारी के बाद अपनी जिंदगी पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे हैं। मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों के लिए 10 रुपये की महंगाई भी बहुत बड़ा बोझ होती है।
खाद्य और उर्वरक (Fertilizer) की बढ़ती कीमतें विकासशील देशों में भुखमरी का खतरा बढ़ा सकती हैं। आईएमएफ ने साफ कहा है कि इस अनिश्चित दुनिया में अब अमीर देशों को गरीब देशों का हाथ थामना होगा, वरना यह आर्थिक खाई इतनी गहरी हो जाएगी कि इसे भरना नामुमकिन होगा।
आईएमएफ की चेतावनी एक ‘वेक-अप कॉल’ (जागने का इशारा) है। युद्ध कभी भी सिर्फ सरहदों तक सीमित नहीं रहता; वह आपके बैंक बैलेंस, आपकी नौकरी और आपके बच्चों के भविष्य तक पहुँच जाता है। अब यह देखना होगा कि दुनिया के बड़े नेता इस चेतावनी को कितनी गंभीरता से लेते हैं और वैश्विक शांति के लिए क्या कदम उठाते हैं।