उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले हलचल तेज हो गई है। बिहार और महाराष्ट्र में कुछ चुनावी सफलता के बाद Asaduddin Owaisi की पार्टी All India Majlis-e-Ittehadul Muslimeen (AIMIM) ने यूपी में बड़े स्तर पर उतरने की तैयारी की थी। लेकिन एंट्री से पहले ही सियासी समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं।
AIMIM की यूपी इकाई के नेताओं ने संकेत दिए थे कि उनकी बातचीत Bahujan Samaj Party (बसपा) से चल रही है। माना जा रहा था कि अगर बसपा साथ आती है तो दलित-मुस्लिम समीकरण के जरिए ओवैसी की पार्टी को यूपी में मजबूत जमीन मिल सकती है। लेकिन बसपा प्रमुख Mayawati ने साफ कर दिया कि उनकी पार्टी किसी भी दल के साथ गठबंधन नहीं करेगी। उन्होंने कहा कि चुनाव के समय ऐसे दावे बढ़ जाते हैं, लेकिन बसपा को गठबंधन से नुकसान होता है।
मायावती के इस बयान के बाद AIMIM की संभावित रणनीति को बड़ा झटका लगा है। पार्टी की कोशिश थी कि बसपा के “हाथी” के साथ “पतंग” का गठजोड़ बनाकर मुस्लिमों के साथ-साथ दलित और पिछड़े वोटों में भी पैठ बनाई जाए। लेकिन अब यह रास्ता लगभग बंद नजर आ रहा है।
उधर Akhilesh Yadav भी AIMIM की सक्रियता पर नजर बनाए हुए हैं। समाजवादी पार्टी 2024 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ मिलकर अच्छा प्रदर्शन कर चुकी है और उसका फोकस 2027 में मुस्लिम वोटों को एकजुट बनाए रखने पर है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार 2022 विधानसभा चुनाव में मुस्लिम मतों का बड़ा हिस्सा सपा के साथ गया था, जिससे पार्टी को सीटों में बढ़त मिली। 2024 में भी विपक्षी एकजुटता का फायदा मिला।
उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी करीब 19 प्रतिशत मानी जाती है। लंबे समय से यह वर्ग सपा का मजबूत आधार रहा है। वहीं बसपा भी पिछले कई वर्षों से मुस्लिम मतदाताओं को जोड़ने की कोशिश करती रही है। ऐसे में AIMIM की एंट्री से वोटों के बंटवारे की आशंका बढ़ जाती है। यही कारण है कि सपा और अन्य दल सतर्क हैं।
महाराष्ट्र के निकाय चुनावों में AIMIM के प्रदर्शन ने भी विपक्षी दलों का ध्यान खींचा है। कुछ मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में पार्टी ने उल्लेखनीय प्रदर्शन किया, जिससे पारंपरिक दलों को चुनौती मिली। ओवैसी अक्सर आरोप लगाते रहे हैं कि मुख्यधारा की पार्टियां मुसलमानों को सिर्फ वोट बैंक के रूप में देखती हैं, जबकि AIMIM उन्हें राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने की बात करती है।
यूपी की सियासत में वोट बंटवारे का असर पहले भी देखा गया है। 2017 विधानसभा चुनाव में विपक्षी मतों के विभाजन से भाजपा को फायदा हुआ था। वहीं 2022 में अपेक्षाकृत एकजुट वोटिंग से सपा की सीटें बढ़ीं। ऐसे में 2027 से पहले हर पार्टी अपने समीकरण साधने में जुटी है।
अब सवाल यह है कि बसपा के इनकार और सपा की सतर्कता के बाद AIMIM क्या करेगी? क्या पार्टी अकेले चुनावी मैदान में उतरेगी, या छोटे दलों के साथ गठबंधन तलाशेगी? या फिर सीमित सीटों पर फोकस कर रणनीतिक उपस्थिति दर्ज कराएगी?
फिलहाल इतना तय है कि यूपी की राजनीति में मुस्लिम वोटों की अहम भूमिका रहेगी और AIMIM की सक्रियता से सियासी हलचल बनी रहेगी। आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि ओवैसी की पार्टी इस चुनौती को अवसर में बदल पाती है या नहीं।