उद्धव–राज ठाकरे की नजदीकियां: महाराष्ट्र में शिवसेना (यूबीटी) और मनसे के संभावित गठबंधन से सियासी हलचल

उद्धव–राज ठाकरे की मुलाकात: बीएमसी चुनाव से पहले सियासी समीकरण में बदलाव के संकेत

Vin News Network
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उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की दो हफ्तों में दूसरी सार्वजनिक मुलाकात
Highlights
  • बीएमसी समेत आगामी स्थानीय निकाय चुनावों के लिए गठबंधन के संकेत
  • बेस्ट एम्प्लॉइज सोसाइटी के चुनाव में दोनों दलों को करारी हार
  • भाजपा बोली – जनता को पारिवारिक बैठकों से नहीं, विकास से मतलब

महाराष्ट्र की राजनीति में कभी कट्टर प्रतिद्वंद्वी रहे दो नेता अब बार-बार एक ही मंच पर नजर आने लगे हैं। शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे और उनके चचेरे भाई, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) अध्यक्ष राज ठाकरे के बीच बढ़ती नजदीकियां राज्य की सियासत में नए समीकरण गढ़ रही हैं। बुधवार को उद्धव ठाकरे ने राज ठाकरे के दादर स्थित आवास ‘शिवतीर्थ’ पर मुलाकात की। यह पिछले दो हफ्तों में दोनों नेताओं की दूसरी सार्वजनिक बैठक है।

शिवतीर्थ पर अहम बैठक
दोनों नेताओं के बीच यह मुलाकात ऐसे समय हुई है जब महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय चुनाव और बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) चुनाव की तैयारी चल रही है। उद्धव ठाकरे गणेश उत्सव के अवसर पर भी पिछले महीने ‘शिवतीर्थ’ गए थे। इससे पहले 5 जुलाई को दोनों ने सरकार की त्रिभाषा नीति के खिलाफ मुंबई में आयोजित कार्यक्रम में एक मंच साझा किया था। महाराष्ट्र सरकार ने मराठी बहुल राज्य में हिंदी थोपने के आरोपों के बीच कक्षा 1 से 5 तक के छात्रों के लिए त्रिभाषा फॉर्मूला वापस ले लिया था, जिसके बाद यह मंचन हुआ।

पारिवारिक रिश्तों में गर्माहट
जुलाई के अंत में राज ठाकरे उद्धव ठाकरे को उनके जन्मदिन पर शुभकामना देने के लिए बांद्रा स्थित ‘मातोश्री’ पहुंचे थे। यह दोनों दलों के बीच रिश्तों की नई शुरुआत के संकेत थे। लंबे समय तक दोनों के बीच कटुता रही थी। राज ठाकरे ने 2005 में शिवसेना छोड़ दी थी और इसके लिए उद्धव ठाकरे को जिम्मेदार ठहराया था।

गठबंधन के संकेत
2024 के विधानसभा चुनाव में दोनों दलों को करारी हार का सामना करना पड़ा। अब दोनों प्रतिद्वंद्वी दल अपने रिश्ते सुधारने और राजनीतिक हित साधने के लिए मजबूर हैं। बीएमसी सहित आगामी स्थानीय निकाय चुनावों के लिए दोनों पार्टियों ने गठबंधन बनाने के संकेत दिए हैं। हालांकि, अब तक औपचारिक गठबंधन की घोषणा नहीं हुई है। अगर ऐसा होता है तो भाजपा उनकी मुख्य प्रतिद्वंद्वी होगी।

बेस्ट चुनाव में झटका
गठबंधन की चर्चा के बीच पिछले महीने ‘बेस्ट एम्प्लॉइज कोऑपरेटिव क्रेडिट सोसाइटी लिमिटेड’ के चुनाव में शिवसेना (यूबीटी) और मनसे को करारा झटका लगा। दोनों दलों के समर्थित पैनल को सभी 21 सीटों पर हार का सामना करना पड़ा। इस हार ने दोनों को मजबूर किया कि वे अपनी रणनीति नए सिरे से सोचें। स्थानीय स्तर पर प्रभावी होने के लिए दोनों दलों को साथ आना पड़ सकता है।

भाजपा का तंज
भाजपा की मुंबई इकाई के प्रमुख और विधायक अमीत साटम ने बुधवार को कहा कि जनता का ध्यान नेताओं के बीच पारिवारिक बैठकों पर नहीं बल्कि विकास के मुद्दों पर है। “यह इस बारे में नहीं है कि कौन किससे मिल रहा है और उनके पारिवारिक रिश्ते कैसे हैं,” उन्होंने कहा। “यह इस बारे में है कि अटल सेतु, कोस्टल रोड, वर्ली और बीडीडी चॉल का पुनर्विकास किसने करवाया और किसने पूरे मुंबई में सीसीटीवी कैमरों का विशाल नेटवर्क स्थापित किया।” भाजपा का मानना है कि मुंबईकर इसी आधार पर वोट देंगे।

पिछले अनुभव और नया समीकरण
राज ठाकरे ने जब 2005 में मनसे बनाई थी, तब से लेकर अब तक दोनों दलों के बीच वैचारिक और राजनीतिक दूरी रही। मनसे ने मराठी मानुष के मुद्दे को आगे रखा जबकि उद्धव के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) ने राष्ट्रीय मुद्दों पर भी अपनी भूमिका मजबूत की। 2024 के चुनावी परिणामों ने दोनों को यह सोचने पर मजबूर किया कि अकेले चुनाव लड़ना उनके लिए घाटे का सौदा हो सकता है।

बीएमसी चुनाव में क्या हो सकता है?
बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) देश की सबसे समृद्ध नगर निगम है। शिवसेना ने दशकों तक इस पर अपना दबदबा बनाए रखा। उद्धव ठाकरे के मुख्यमंत्री बनने के बाद और शिंदे गुट के अलग होने के बाद यह नियंत्रण कमजोर हुआ। भाजपा इस बार बीएमसी जीतने की पूरी कोशिश कर रही है। ऐसे में अगर शिवसेना (यूबीटी) और मनसे साथ आ जाते हैं तो मुंबई की सियासत में बड़ा बदलाव हो सकता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि उद्धव-राज गठबंधन भाजपा के लिए चुनौती बन सकता है। मराठी मतदाताओं के बड़े हिस्से को साधने में दोनों की साझेदारी कारगर हो सकती है। हालांकि, गठबंधन की शर्तें, सीट बंटवारा और नेतृत्व का मुद्दा अभी स्पष्ट नहीं है। दोनों दलों के कार्यकर्ताओं में भी आपसी तालमेल की चुनौती रहेगी।

उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की बढ़ती नजदीकियां न सिर्फ महाराष्ट्र बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी नए समीकरण गढ़ सकती हैं। बीएमसी और अन्य स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजे तय करेंगे कि यह गठबंधन कितना प्रभावी होगा। भाजपा पहले ही विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ने की रणनीति बना चुकी है, इसलिए इस तिकड़ी की जंग और दिलचस्प होने वाली है।

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