महाराष्ट्र के इस इलाके का बदला जाएगा नाम, छगन भुजबल बोले- कैबिनेट प्रस्ताव केंद्र को भेजा जाएगा

“अब मालेगांव नहीं... नाम परिवर्तन की तैयारी में महाराष्ट्र सरकार!”

Vin News Network
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मालेगांव का नाम बदलने पर महाराष्ट्र सरकार ने बनाई रणनीति
Highlights
  • मालेगांव का नाम बदलने पर महाराष्ट्र सरकार ने बनाई रणनीति
  • छगन भुजबल बोले- कैबिनेट प्रस्ताव केंद्र को भेजा जाएगा
  • नाम बदलने की मांग लंबे समय से उठ रही थी

मुंबई। महाराष्ट्र सरकार एक बार फिर स्थानों के नाम बदलने को लेकर चर्चा में है। इस बार मामला है नासिक जिले के मुस्लिम बहुल इलाके ‘मालेगांव’ का, जिसे लेकर राज्य सरकार के मंत्री छगन भुजबल ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने इस क्षेत्र के नाम परिवर्तन को लेकर कैबिनेट में प्रस्ताव तैयार किया है, जिसे जल्द ही केंद्र सरकार को भेजा जाएगा।

राज्य के खाद्य और नागरिक आपूर्ति मंत्री भुजबल ने इस विषय पर खुलकर प्रतिक्रिया दी है। उनके मुताबिक, जनता की भावनाओं और ऐतिहासिक संदर्भों को ध्यान में रखते हुए नाम बदलने की प्रक्रिया शुरू की गई है।

क्या है मामला?
महाराष्ट्र के नासिक जिले में स्थित मालेगांव शहर का नाम बदलने की मांग लंबे समय से की जा रही थी। यह इलाका धार्मिक और सामाजिक रूप से संवेदनशील रहा है। कुछ समूहों का कहना है कि इस क्षेत्र का नाम ऐतिहासिक या सांस्कृतिक दृष्टि से उपयुक्त नहीं है।

मंत्री छगन भुजबल ने कहा: “हम जनता की भावनाओं का सम्मान करते हैं। नाम बदलने का प्रस्ताव कैबिनेट में पास किया जाएगा और फिर केंद्र सरकार को भेजा जाएगा।”

केंद्र से मंजूरी जरूरी
भारत में किसी भी शहर या कस्बे का नाम बदलने के लिए राज्य सरकार की सिफारिश के बाद केंद्र सरकार की मंजूरी आवश्यक होती है। केंद्र में गृह मंत्रालय नाम बदलने की प्रक्रिया को अंतिम मुहर देता है। ऐसे में भुजबल के बयान को राजनीतिक और प्रशासनिक दृष्टि से अहम माना जा रहा है।

इससे पहले भी बदले गए कई नाम
यह पहली बार नहीं है जब महाराष्ट्र में किसी क्षेत्र का नाम बदलने की कोशिश की जा रही है। इससे पहले— औरंगाबाद का नाम बदलकर छत्रपति संभाजीनगर किया गया, उस्मानाबाद का नाम बदलकर धराशिव किया गया। इन दोनों नामों को केंद्र सरकार से भी मंजूरी मिल चुकी है।

राजनीतिक बयानबाजी तेज
भुजबल के बयान के बाद राजनीतिक बहस भी तेज हो गई है। विपक्षी दलों ने इसे “ध्यान भटकाने वाली राजनीति” करार दिया है। वहीं, कुछ सामाजिक संगठनों और स्थानीय नेताओं ने इस कदम का समर्थन किया है।

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