भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने मंगलवार को शक्सगाम घाटी को लेकर चीन के दावे को सख्त शब्दों में खारिज कर दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि भारत शक्सगाम घाटी में किसी भी तरह की गतिविधि को स्वीकार नहीं करता और 1963 में हुआ तथाकथित चीन-पाकिस्तान सीमा समझौता भारत के लिए पूरी तरह अवैध है। यह वही समझौता है, जिसके तहत पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर के एक हिस्से में स्थित 5,180 वर्ग किलोमीटर भारतीय क्षेत्र को चीन को सौंप दिया था। भारत ने न तो उस समय और न ही आज कभी इस समझौते को मान्यता दी है।
सेना दिवस (15 जनवरी) से पहले अपनी पारंपरिक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोलते हुए सेना प्रमुख ने कहा कि शक्सगाम घाटी भारतीय क्षेत्र है और वहां चीन या पाकिस्तान द्वारा की जा रही किसी भी तरह की निर्माण या बुनियादी ढांचा गतिविधि को भारत मंजूरी नहीं देता। उन्होंने यह टिप्पणी ऐसे समय में की है, जब एक दिन पहले ही चीन ने सार्वजनिक रूप से दावा किया था कि शक्सगाम घाटी उसका क्षेत्र है और वहां इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना पूरी तरह उसका अधिकार है।
जनरल द्विवेदी ने चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) को लेकर भी भारत का रुख दोहराया। उन्होंने कहा कि भारत सीपीईसी को नहीं मानता, क्योंकि यह भारतीय क्षेत्र से होकर गुजरता है, जो पाकिस्तान के अवैध कब्जे में है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि चीन और पाकिस्तान द्वारा इस क्षेत्र में की जा रही गतिविधियां अंतरराष्ट्रीय कानून और भारत की संप्रभुता का उल्लंघन हैं।
इससे पहले चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने बीजिंग में एक मीडिया ब्रीफिंग के दौरान कहा था कि शक्सगाम घाटी चीन का क्षेत्र है और वहां किए जा रहे निर्माण कार्य पूरी तरह उचित हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि चीन और पाकिस्तान ने 1960 के दशक में एक सीमा समझौता किया था, जो दो संप्रभु देशों के अधिकार क्षेत्र में आता है। हालांकि भारत ने इस बयान पर कड़ा विरोध दर्ज कराया।
भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने 9 जनवरी को कहा था कि शक्सगाम घाटी भारत का अभिन्न हिस्सा है और भारत ने कभी भी 1963 के चीन-पाकिस्तान सीमा समझौते को स्वीकार नहीं किया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारत को अपने हितों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाने का पूरा अधिकार है। शक्सगाम ट्रैक्ट, जिसमें शक्सगाम घाटी शामिल है, कराकोरम वाटरशेड के उत्तर में स्थित है और यह क्षेत्र 1963 से चीन के अवैध कब्जे में है। इससे पहले 1947 के बाद यह इलाका पाकिस्तान के कब्जे में था, जिसे बाद में उसने चीन को सौंप दिया।
चीन के साथ उत्तरी सीमा पर हालात को लेकर सेना प्रमुख ने कहा कि स्थिति फिलहाल स्थिर है, लेकिन लगातार सतर्कता बेहद जरूरी है। उन्होंने बताया कि शीर्ष स्तर की बातचीत, संपर्क बहाली और विश्वास-निर्माण के उपायों से हालात धीरे-धीरे सामान्य हो रहे हैं। इन प्रयासों की वजह से उत्तरी सीमाओं पर चराई, हाइड्रोथेरेपी कैंप और अन्य गतिविधियां दोबारा शुरू हो पाई हैं।
जनरल द्विवेदी ने कहा कि वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर भारतीय सेना की तैनाती संतुलित और मजबूत बनी हुई है। इसके साथ ही क्षमता विकास और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने का काम भी पूरे सरकारी तंत्र के समन्वय से तेजी से किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि भारत ने अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं को ध्यान में रखते हुए सीमा क्षेत्रों में दीर्घकालिक तैयारी सुनिश्चित की है।
उन्होंने यह भी जानकारी दी कि 2024 में पूर्वी लद्दाख के देमचोक और डेपसांग क्षेत्रों में भारतीय सेना ने चार साल से अधिक समय बाद फिर से गश्त शुरू की। इससे अप्रैल 2020 में भारत-चीन सैन्य गतिरोध शुरू होने से पहले जैसी स्थिति बहाल हो सकी। इस प्रगति के साथ भारतीय सेना और चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के बीच लंबे समय से अटकी बातचीत को नई दिशा मिली। सितंबर 2022 में गोगरा-हॉट स्प्रिंग्स क्षेत्र के पेट्रोलिंग प्वाइंट-15 से अंतिम चरण की वापसी के बाद बातचीत दो साल तक ठप रही थी।
अक्टूबर 2024 से दोनों देशों ने सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए मिलकर काम किया है। सेना प्रमुख ने कहा कि दोनों पक्षों की ओर से भरोसा बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं और सीमाओं को यथासंभव शांत रखने की तात्कालिक आवश्यकता को दोनों समझते हैं। उन्होंने कहा कि बलों की तैनाती या कमी समय, स्थान और संसाधनों पर निर्भर करती है, लेकिन लक्ष्य यह है कि जरूरत पड़ने पर सेना तय समय में किसी भी मोर्चे पर प्रभावी तैनाती कर सके।
जनरल द्विवेदी ने बताया कि सीमा से जुड़े मुद्दों के समाधान के लिए दो समूह बनाए गए हैं। एक विशेषज्ञ समूह सीमा निर्धारण पर काम कर रहा है, जबकि दूसरा कार्यकारी समूह सीमा प्रबंधन से जुड़े मामलों को देख रहा है। उन्होंने कहा कि इन समूहों से मिलने वाले दिशानिर्देशों के आधार पर जमीनी स्तर पर आगे की कार्रवाई होगी।
सेना प्रमुख ने पाकिस्तान में सक्रिय आतंकवादी शिविरों को लेकर भी बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद आतंकियों द्वारा शुरू की गई घटनाएं लगभग शून्य हो गई हैं, लेकिन पाकिस्तान में अब भी आठ आतंकी शिविर सक्रिय हैं, जिनमें करीब 100 से 150 लोग मौजूद हैं। इनमें से दो शिविर अंतरराष्ट्रीय सीमा के पार हैं, जबकि छह नियंत्रण रेखा (LoC) के उस पार स्थित हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर पाकिस्तान की ओर से भारत के खिलाफ आतंक को बढ़ावा दिया गया, तो सख्त कार्रवाई की जाएगी।
ऑपरेशन सिंदूर अप्रैल 22 को पहलगाम में हुए आतंकी हमले के जवाब में शुरू किया गया था, जिसमें 26 लोगों की जान गई थी। 7 मई की सुबह शुरू हुए इस ऑपरेशन में भारत ने पाकिस्तान और पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर में आतंकी और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। 10 मई को सीजफायर के साथ यह चार दिन का सैन्य टकराव समाप्त हुआ।
सेना प्रमुख ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर पूरी रणनीतिक स्पष्टता और सटीकता के साथ अंजाम दिया गया। उन्होंने बताया कि महज 22 मिनट की शुरुआती कार्रवाई और 88 घंटे तक चले समन्वित अभियान ने आतंकवादी ढांचे को गहरी चोट पहुंचाई और लंबे समय से चले आ रहे परमाणु धमकी के नैरेटिव को भी कमजोर किया। उन्होंने कहा कि यह एक सतत ऑपरेशन है और भविष्य में किसी भी दुस्साहस का जवाब मजबूती से दिया जाएगा।
सेना प्रमुख के बयान से यह स्पष्ट है कि भारत शक्सगाम घाटी समेत अपने क्षेत्रीय दावों पर किसी भी तरह का समझौता नहीं करेगा। साथ ही, चीन और पाकिस्तान दोनों को