अमेरिका में बढ़ती महंगाई को लेकर जारी बहस के बीच फेडरल रिजर्व के चेयरमैन जेरोम पॉवेल ने इसकी प्रमुख वजह पर स्थिति स्पष्ट की है। उन्होंने कहा कि हालिया महंगाई दबाव का मुख्य कारण घरेलू मांग में तेजी नहीं, बल्कि आयातित वस्तुओं पर लगाए गए टैरिफ हैं। यह बयान बुधवार (स्थानीय समय) को फेडरल ओपन मार्केट कमेटी (FOMC) की बैठक के बाद आया, ऐसे समय में जब वैश्विक अर्थव्यवस्थाएं अमेरिकी व्यापार नीतियों और उनके अंतरराष्ट्रीय प्रभावों पर करीबी नजर बनाए हुए हैं।
महंगाई के पीछे टैरिफ की भूमिका
जेरोम पॉवेल ने कहा,
“महंगाई के ये ऊंचे आंकड़े मुख्य रूप से वस्तुओं के क्षेत्र में बढ़ी कीमतों को दर्शाते हैं और यह बढ़ोतरी टैरिफ के असर से हुई है।”
उन्होंने बताया कि आयात पर लगाए गए शुल्क के कारण वस्तुओं की कीमतों में तेजी देखी गई है, जबकि सेवाओं के क्षेत्र में महंगाई का दबाव धीरे-धीरे कम हो रहा है। पॉवेल के अनुसार, मौजूदा स्थिति को केवल उपभोक्ता मांग से जोड़कर देखना सही नहीं होगा।
ब्याज दरों पर फेड का फैसला
इसी बैठक में FOMC ने ब्याज दरों को 3.5 से 3.75 प्रतिशत के दायरे में यथावत रखने का निर्णय लिया।
पॉवेल ने कहा कि मौजूदा मौद्रिक नीति उपयुक्त है, क्योंकि महंगाई अभी भी फेडरल रिजर्व के 2 प्रतिशत के लक्ष्य से ऊपर बनी हुई है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि ब्याज दरों को लेकर फिलहाल कोई जल्दबाजी नहीं की जा रही है और फैसले आने वाले आर्थिक आंकड़ों के आधार पर लिए जाएंगे।
टैरिफ का प्रभाव: अस्थायी या दीर्घकालिक?
टैरिफ के प्रभाव पर बोलते हुए पॉवेल ने कहा,
“टैरिफ का बड़ा हिस्सा अर्थव्यवस्था में पहले ही दिख चुका है। आमतौर पर टैरिफ एक बार की कीमत वृद्धि की तरह होते हैं।”
उन्होंने यह भी कहा कि टैरिफ से जुड़ी महंगाई पहले चरम स्तर पर पहुंच सकती है और उसके बाद धीरे-धीरे कम होने की संभावना रहती है, बशर्ते कोई नया बड़ा टैरिफ नहीं लगाया जाए।
उनके मुताबिक, जहां व्यापार उपायों के कारण वस्तुओं की कीमतें बढ़ी हैं, वहीं सेवाओं के क्षेत्र में महंगाई का रुझान अलग है और वहां नरमी देखी जा रही है।
महंगाई के ताजा आंकड़े
फेड चेयरमैन ने महंगाई के आंकड़ों का जिक्र करते हुए बताया कि दिसंबर तक के 12 महीनों में कोर पीसीई (Personal Consumption Expenditure) महंगाई 3.0 प्रतिशत रही, जबकि कुल पीसीई महंगाई 2.9 प्रतिशत दर्ज की गई।
उन्होंने कहा कि बाजारों और आम लोगों की महंगाई को लेकर अपेक्षाएं फिलहाल स्थिर बनी हुई हैं। ज्यादातर दीर्घकालिक अनुमान फेड के 2 प्रतिशत के लक्ष्य के आसपास हैं, जो केंद्रीय बैंक के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जाता है।
भविष्य की मौद्रिक नीति पर रुख
भविष्य की नीति को लेकर पॉवेल ने साफ किया कि फेडरल रिजर्व की कोई पूर्व निर्धारित समय-सारिणी नहीं है।
उन्होंने कहा,
“मौद्रिक नीति किसी तय रास्ते पर नहीं चल रही है। हम हर बैठक में हालात का आकलन कर निर्णय करेंगे।”
इसका मतलब है कि ब्याज दरों में बदलाव पूरी तरह आर्थिक आंकड़ों, महंगाई के रुझान और वैश्विक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति
अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर बात करते हुए पॉवेल ने कहा कि विकास की रफ्तार मजबूत बनी हुई है।
उन्होंने बताया कि उपभोक्ता खर्च में मजबूती है और व्यवसायों का निवेश बढ़ रहा है, हालांकि हाउसिंग सेक्टर अब भी कमजोर स्थिति में है।
उन्होंने यह भी माना कि हाल के महीनों में महंगाई में सुधार की गति कुछ धीमी पड़ी है, लेकिन इसका मुख्य कारण मांग नहीं है। पॉवेल के अनुसार,
“अगर यह टैरिफ की वजह से नहीं होता, तो इसे मांग से जुड़ा माना जाता और मांग से पैदा हुई महंगाई को काबू में करना कहीं ज्यादा कठिन होता।”
वैश्विक असर और भारत के लिए मायने
अमेरिका भारत के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में से एक है। ऐसे में अमेरिकी व्यापार नीति, टैरिफ और महंगाई के रुझानों का असर वैश्विक सप्लाई चेन, निर्यात कीमतों और निवेश प्रवाह पर भी पड़ता है।
आमतौर पर केंद्रीय बैंक टैरिफ से पैदा हुई महंगाई को अस्थायी मानते हैं, जब तक कि यह दीर्घकालिक महंगाई अपेक्षाओं को प्रभावित न करे।