चुनाव आयोग ने देश के सभी राष्ट्रीय और मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को निर्देश जारी करते हुए कहा है कि वे एक महीने के भीतर अपने पार्टी संविधान का अपडेटेड और पूर्ण संस्करण आयोग के पास जमा करें। यह आदेश ऐसे समय में आया है जब सुप्रीम कोर्ट राजनीतिक दलों की पंजीकरण प्रक्रिया और उनके संचालन में पारदर्शिता लाने से संबंधित एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहा है।
सोमवार को राजनीतिक दलों को भेजे पत्र में आयोग ने कहा कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29ए के तहत किसी भी दल का पंजीकरण तब पूरा होता है जब वह अपने नियमों और विनियमों से जुड़ा मेमोरेंडम जमा करता है। इस दस्तावेज़ का अहम हिस्सा पार्टी का संविधान होता है, जिसमें दल की आंतरिक कार्यप्रणाली से लेकर निर्णय लेने की प्रक्रियाओं तक सभी प्रावधान दर्ज रहते हैं।
आयोग ने साफ किया कि पार्टी का संविधान केवल एक औपचारिक दस्तावेज नहीं, बल्कि वह आधार है, जिसके जरिए पार्टी लोकतांत्रिक तरीके से काम करती है। आयोग का कहना है कि यह जानकारी सदस्यों तक पहुंचना भी आवश्यक है, ताकि वे नियमों का पालन कर सकें और आम जनता को भी यह समझ में आए कि पार्टी किस प्रक्रिया के तहत संचालित होती है।
चुनाव आयोग ने दलों से यह भी कहा है कि वे अपने संविधान की पिछली जमा की गई प्रति के बाद किए गए सभी संशोधनों की कॉपी भी साथ में संलग्न करें। इससे यह सुनिश्चित होगा कि पार्टी ने समय-समय पर वैधानिक आवश्यकताओं का पालन किया है और उसकी कार्यप्रणाली में आवश्यक पारदर्शिता बनी हुई है।
यह निर्देश ऐसे समय में जारी किया गया है जब सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट अश्विनी कुमार उपाध्याय की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई चल रही है। याचिका में मांग की गई है कि केंद्र सरकार और चुनाव आयोग राजनीतिक दलों के संचालन के लिए स्पष्ट वैधानिक नियम तैयार करें, जिनमें आंतरिक ढांचा, वित्तीय पारदर्शिता, निर्णय लेने की प्रक्रिया और जवाबदेही से जुड़े प्रावधान शामिल हों।
सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे पर चल रही सुनवाई के बीच चुनाव आयोग द्वारा संविधान की अपडेटेड कॉपी की मांग करना महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह कदम राजनीतिक दलों की संरचना और कार्यप्रणाली को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकता है।