सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को अवैध निर्माणों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया और अदालतों को चेतावनी दी कि केवल इसलिए किसी उल्लंघनकर्ता को छोड़ना उचित नहीं कि नगर निगम के नियमों के तहत फीस जमा करने पर उनका निर्माण कंपाउंड किया जा सकता है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमलया बागची की पीठ ने कहा कि इस तरह के मामलों में सही प्रक्रिया अवैध निर्माण को गिराने, गिराने की लागत वसूलने और उल्लंघनकर्ताओं पर उदाहरणात्मक जुर्माना लगाने की है। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि अदालतें ऐसी याचिकाओं को स्वीकार कर लें, तो लोग सार्वजनिक सड़कों और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर कब्जा करने के लिए नियमों का हवाला देकर अधिकारियों को वर्षों तक कानूनी प्रक्रिया में उलझा सकते हैं।
इस कड़ी टिप्पणी के बीच, सुप्रीम कोर्ट ने सिकंदराबाद में अवैध निर्माण के खिलाफ की गई याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि केवल नियमों के आधार पर उल्लंघनकर्ताओं को छूट देना समाज के लिए खतरनाक precedent स्थापित करेगा।
अदालत का रुख यह दर्शाता है कि अवैध निर्माण पर सख्त कार्रवाई और नियमों का सही पालन दोनों ही जरूरी हैं। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि भविष्य में इस तरह की याचिकाओं के माध्यम से लोगों द्वारा सार्वजनिक संपत्ति पर कब्जा करने या कानून को दरकिनार करने की किसी भी कोशिश को मंजूरी नहीं दी जाएगी।
विशेषज्ञों के अनुसार, अदालत का यह निर्णय शहरी नियोजन और कानून का पालन सुनिश्चित करने के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। इससे न केवल अवैध निर्माण पर रोक लगेगी, बल्कि प्रशासनिक अधिकारियों की स्थिति भी मजबूत होगी, और नागरिकों को कानून के सही पालन का संदेश जाएगा।