मुंबई के अंधेरी रेलवे स्टेशन से हाल ही में वायरल हुई वीडियो ने शहर के स्थानीय ट्रेन नेटवर्क में सुरक्षा और भीड़-भाड़ की गंभीर स्थिति को फिर से उजागर किया है। इन वीडियोज़ में देखा जा सकता है कि प्लेटफॉर्म और फुटब्रिज पूरी तरह से यात्रियों से भरे हुए हैं। अचानक प्लेटफॉर्म बदल जाने पर लोग दौड़ते हुए ट्रेन पकड़ने की कोशिश कर रहे हैं। कुछ यात्रियों को अपनी जान जोखिम में डालकर ट्रैक पर कदम रखना पड़ा, ताकि वे अपनी ट्रेन मिस न करें। यह दृश्य मुंबई के दैनिक रेल उपयोगकर्ताओं के सामने खड़ी लगातार चुनौतियों को दिखाता है।
वायरल वीडियो के बाद एक बड़ा सवाल उठता है कि क्या मुंबई का तेजी से बढ़ता मेट्रो नेटवर्क वाकई में लोकल ट्रेनों पर पड़ने वाले दबाव को कम करने में सफल रहा है? मेट्रो के आने से क्या यात्रा के घंटों में सुरक्षा और आराम में कोई सुधार हुआ है या यह केवल नाम का राहत है?
मुंबई लोकल ट्रेनें कितनी भीड़भाड़ वाली हैं?
मुंबई की लोकल ट्रेनें दुनिया में सबसे अधिक भीड़ वाली मानी जाती हैं। पीक आवर्स में “सुपर-डेंस क्रश लोड” देखा जाता है, जिसमें लगभग 14-16 यात्री प्रति वर्ग मीटर खड़े रहते हैं। एक सामान्य 12-15 कोच की ट्रेन में आधिकारिक तौर पर 2,000 यात्री ही सवार हो सकते हैं, लेकिन वास्तविकता में यह संख्या कई गुना अधिक होती है। रोज़ाना यह नेटवर्क 7.5 मिलियन से अधिक यात्रियों को ले जाता है, जिससे यह दुनिया की सबसे व्यस्त उपनगरीय रेल प्रणाली बन गई है।
पीक आवर्स में स्थिति कैसी रहती है?
सुबह 7 से 11 बजे और शाम 5 से 9 बजे तक का समय सबसे कठिन होता है। इस दौरान ट्रेनें और प्लेटफॉर्म पूरी तरह दबाव वाली जगह में बदल जाते हैं। कोचों के दरवाजे, खिड़कियां और फुटबोर्ड भीड़ से लदे होते हैं। प्लेटफॉर्म इतने भर जाते हैं कि यात्री धक्का-मुक्की करने, दौड़कर ट्रेन पकड़ने या सही समय का इंतजार करने पर मजबूर हो जाते हैं। यहां तक कि महिला और फर्स्ट क्लास कोच भी भारी भीड़ का सामना करते हैं, जबकि सामान्य कोच तीन गुना अधिक क्षमता से भी भर जाते हैं।
भीड़भाड़ से यात्रियों को क्या खतरे हैं?
सबसे ज्यादा भीड़ सोमवार से शनिवार तक होती है। सेंट्रल और वेस्टर्न लाइनें सबसे अधिक व्यस्त हैं, विशेषकर सीएसएमटी, दादर, ठाणे, कुर्ला और अंधेरी स्टेशनों पर। सप्ताहांत में शाम की भीड़ कम होती है। भीड़भाड़ से रोज़ाना सुरक्षा खतरे बढ़ जाते हैं। कई यात्री फुटबोर्ड पर लटककर सफर करते हैं, जिससे गिरने का जोखिम होता है। खासकर मुंब्रा जैसी कर्व वाली जगहों पर ट्रेन झुकने के कारण कई हादसे हो चुके हैं। औसतन हर दिन 7-10 लोग गिरने या ट्रैक पर उतरने के कारण अपनी जान गंवाते हैं। केवल 2025 में ही 525 मौतें भीड़-भाड़ से जुड़ी घटनाओं में हुईं।
अध्ययन और रिपोर्ट क्या कहते हैं?
मुंबई अर्बन ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट (MUTP) की रिपोर्ट बताती है कि 9-कोच ट्रेन में 5,000 यात्री सवार हो जाते हैं। 2013 में A.K. जैन के UN पेपर के अनुसार 2004 से 2024 के बीच 66,500 मौतें भीड़भाड़ से हुईं। 2017 में PAC की रिपोर्ट के अनुसार, हर साल लगभग 6,000 मौतें इस नेटवर्क से जुड़ी हुई हैं।
मुंबई मेट्रो ने कितनी राहत दी?
लाइन 2A और 7 के खुलने के बाद कुछ वेस्टर्न रेलवे स्टेशनों पर यात्रियों की संख्या कम हुई। दहिसर में 33% और अंधेरी में 28% यात्रियों की कमी देखी गई। 2025 तक मेट्रो का दैनिक यात्री परिचालन 9 लाख पहुंच गया। हालांकि, लोकल ट्रेनें अभी भी लगभग 7.5 मिलियन यात्रियों को रोज़ाना ले जा रही हैं, जो कोविद-पूर्व स्तर से 14-20% कम है। मेट्रो ने कुछ राहत दी है, लेकिन सेंट्रल और हार्बर लाइन में मेट्रो की कमी और विस्तार में देरी के कारण लोकल ट्रेनें अभी भी मुख्य साधन हैं।
मुंबई की लोकल ट्रेन और मेट्रो नेटवर्क
मुंबई में तीन मुख्य रेल कॉरिडोर हैं। वेस्टर्न लाइन चर्चगेट से विरार तक 121 किलोमीटर में फैली है और इसमें 43 स्टेशन हैं। सेंट्रल लाइन सीएसएमटी से कल्याण और उससे आगे कसारा और करजत-खोपोली तक जाती है। हार्बर लाइन सीएसएमटी से पनवेल तक चलती है और नव मुंबई से जुड़ती है।
मेट्रो की बात करें तो लाइन 1 वर्सोवा से घाटकोपर तक है, लाइन 2A और 7 वेस्टर्न लाइन के साथ अंधेरी से दहिसर तक चलती हैं। लाइन 3 (अक्वा लाइन) कोलाबा, BKC, SEEPZ और आरे तक जाएगी और अक्टूबर 2025 तक पूरी तरह से संचालन में आ जाएगी।
आने वाले मेट्रो विस्तार
लाइन 2B डीएन नगर से वडाला तक जाएगी। लाइन 4 और 4A वडाला को कसारवडावली से जोड़ेंगी। लाइन 5 और 9 ठाणे को मीरा भायंदर से जोड़ेंगी। लाइन 6 और 10 जोगेश्वरी, विक्रोली और मीरा रोड के बीच चलेंगी। ये सभी 2026-2029 के बीच पूरी होने की उम्मीद है।
ये रूट महत्वपूर्ण हैं क्योंकि मुंबई के सबसे बड़े ऑफिस हब — BKC, साउथ मुंबई CBD, लोअर परेल-वरली, पवई और अंधेरी ईस्ट — रोज़ाना भारी यात्री बहाव आकर्षित करते हैं।
भीड़भाड़ क्यों अभी भी बनी हुई है?
मेट्रो विस्तार के बावजूद राहत असमान है। वेस्टर्न कॉरिडोर में आंशिक आराम जरूर मिला, लेकिन चर्चगेट और विरार के बीच अंतराल ने प्रभाव को सीमित कर दिया। सेंट्रल लाइन में कोई पूरी तरह से ऑपरेशनल मेट्रो नहीं है, इसलिए दबाव अभी भी बहुत ज्यादा है। कुल मिलाकर मेट्रो ने थोड़ी राहत दी है, लेकिन पूरी कनेक्टिविटी के बिना लोकल ट्रेनें मुंबई के यात्रियों की जीवनरेखा बनी हुई हैं।