वीबी-जी रैम-जी बिल पर राहुल गांधी का हमला, बोले—‘मोदी सरकार ने संसद और लोकतंत्र दोनों पर बुलडोजर चला दिया’

Vin News Network
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राहुल गांधी ने वीबी-जी रैम-जी बिल को लेकर मोदी सरकार पर संसद और लोकतंत्र को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया।

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने विकसित भारत–गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) विधेयक, 2025 यानी वीबी-जी रैम-जी बिल को लेकर केंद्र की मोदी सरकार पर तीखा हमला बोला है। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि सरकार ने इस अहम कानून को संसद में व्यापक चर्चा, सार्वजनिक विमर्श और राज्यों की सहमति के बिना पारित कराया। उन्होंने कहा कि यह विधेयक विकास के नाम पर विनाश का रास्ता खोलता है, जिसकी कीमत देश के करोड़ों मेहनतकश लोगों को अपनी आजीविका गंवाकर चुकानी पड़ेगी।

राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट के जरिए कहा कि न तो इस बिल पर संसद में पर्याप्त चर्चा हुई और न ही राज्यों की राय ली गई। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) और लोकतांत्रिक प्रक्रिया—दोनों को कमजोर किया है। राहुल गांधी ने लिखा कि “कोई सार्वजनिक विमर्श नहीं, संसद में कोई चर्चा नहीं, राज्यों की सहमति नहीं—मोदी सरकार ने मनरेगा और लोकतंत्र दोनों पर बुलडोजर चला दिया। यह विकास नहीं, बल्कि विनाश है, जिसकी कीमत लाखों मेहनतकश भारतीयों को अपनी रोज़ी-रोटी खोकर चुकानी पड़ेगी।”

उन्होंने कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी के एक लेख को भी पढ़ने की अपील की, जिसमें इस मुद्दे के हर पहलू को उजागर किया गया है।

संसद से पारित हुआ वीबी-जी रैम-जी विधेयक

गौरतलब है कि संसद ने 18 दिसंबर को विकसित भारत–गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) विधेयक पारित किया था और 21 दिसंबर को इसे राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई। इस विधेयक के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में प्रत्येक परिवार को साल में 125 दिन का मजदूरी आधारित रोजगार देने की गारंटी दी गई है, जो मौजूदा 100 दिनों की सीमा से अधिक है। यह रोजगार उन वयस्क सदस्यों को मिलेगा, जो अकुशल शारीरिक श्रम करने के लिए तैयार होंगे।

विधेयक के अनुसार, केंद्र और राज्यों के बीच फंड साझा करने का अनुपात 60:40 होगा। हालांकि, पूर्वोत्तर राज्यों, हिमालयी राज्यों और कुछ केंद्र शासित प्रदेशों के लिए यह अनुपात 90:10 तय किया गया है। इसमें उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्य भी शामिल हैं।

राज्यों को दी गई विशेष छूट

वीबी-जी रैम-जी बिल के सेक्शन 6 में यह प्रावधान किया गया है कि राज्य सरकारें वित्तीय वर्ष में अधिकतम 60 दिनों की अवधि पहले से अधिसूचित कर सकती हैं। यह अवधि आमतौर पर बुआई और कटाई जैसे कृषि के व्यस्त मौसम को कवर करेगी। सरकार का तर्क है कि इससे कृषि गतिविधियों और रोजगार योजना के बीच बेहतर तालमेल बनेगा।

सोनिया गांधी का केंद्र सरकार पर कड़ा प्रहार

इस बीच कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी केंद्र सरकार पर सीधा हमला बोला है। एक प्रमुख अंग्रेज़ी अखबार में लिखे अपने हालिया लेख में उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार मनरेगा और अन्य अहम कानूनों में बदलाव कर अधिकार आधारित विधायी ढांचे को कमजोर कर रही है।

‘द बुलडोज़्ड डिमोलिशन ऑफ मनरेगा’ शीर्षक वाले इस लेख में सोनिया गांधी ने कहा कि ग्रामीण रोजगार योजना को कमजोर करना एक सामूहिक नैतिक विफलता है, जिसके दीर्घकालिक आर्थिक और मानवीय परिणाम होंगे। उन्होंने लिखा कि इस तरह के कदमों का असर देश के करोड़ों श्रमिकों और ग्रामीण परिवारों पर पड़ेगा।

मनरेगा को बताया सम्मान और अधिकार का प्रतीक

सोनिया गांधी ने अपने लेख में कहा कि मनरेगा केवल एक कल्याणकारी योजना नहीं थी, बल्कि यह एक अधिकार आधारित कार्यक्रम था, जिसने ग्रामीण परिवारों को आजीविका की सुरक्षा और सम्मान दिया। उनके अनुसार, इस योजना के जरिए महात्मा गांधी के ‘सर्वोदय’ यानी सबके कल्याण के विचार को साकार किया गया और काम के अधिकार को व्यवहार में उतारा गया।

उन्होंने लिखा कि मनरेगा का कमजोर होना या समाप्ति की ओर बढ़ना देश के लिए एक सामूहिक नैतिक असफलता है। यह ऐसी विफलता है, जिसके वित्तीय और मानवीय दुष्परिणाम आने वाले वर्षों तक करोड़ों कामगारों को झेलने पड़ेंगे। सोनिया गांधी ने सभी राजनीतिक दलों और नागरिकों से इन अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट होने की अपील की।

राजनीतिक टकराव और आगे की बहस

वीबी-जी रैम-जी बिल को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच टकराव और तेज होता दिख रहा है। जहां सरकार इसे ग्रामीण रोजगार को मजबूत करने और विकसित भारत के लक्ष्य की दिशा में बड़ा कदम बता रही है, वहीं कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इसे मनरेगा को कमजोर करने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं।

आने वाले दिनों में इस विधेयक और इसके प्रभावों को लेकर संसद के बाहर और भीतर राजनीतिक बहस और तेज होने की संभावना है। विपक्ष का कहना है कि रोजगार और आजीविका जैसे संवेदनशील मुद्दों पर व्यापक चर्चा और सहमति जरूरी है, जबकि सरकार अपने फैसले को सुधारात्मक और दूरदर्शी बता रही है।

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