रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने खुलासा किया है कि उन्होंने चीन के तियानजिन में हुए शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ अलास्का में हुई अपनी बातचीत के बारे में जानकारी दी थी। यह खुलासा इसलिए अहम है क्योंकि यह मुलाकात केवल औपचारिक ‘गपशप’ नहीं थी, बल्कि दो बड़े नेताओं के बीच गहरी और गोपनीय चर्चा का हिस्सा थी। पुतिन ने खुद कहा, “यह कोई राज नहीं है, मैंने प्रधानमंत्री मोदी को अलास्का में हुई बातचीत के बारे में बताया था।” उनके इस बयान ने वैश्विक राजनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है।
एससीओ शिखर सम्मेलन का मंच
31 अगस्त और 1 सितंबर को चीन के तियानजिन में आयोजित एससीओ शिखर सम्मेलन में 20 से अधिक देशों के राष्ट्राध्यक्ष और सरकार प्रमुखों के साथ-साथ दस अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधि भी शामिल हुए। यह मंच एशिया-यूरोप क्षेत्र के देशों के बीच राजनीतिक, सुरक्षा और आर्थिक सहयोग का प्रमुख प्लेटफॉर्म है। भारत और रूस इस संगठन के संस्थापक सदस्य रहे हैं, जबकि चीन इसका प्रमुख आयोजक देश है। ऐसे में इस शिखर सम्मेलन में मोदी और पुतिन की मुलाकात स्वाभाविक रूप से सुर्खियों में रही।
पुतिन की ‘औरस’ लिमो में बातचीत क्यों बनी खास
एससीओ शिखर सम्मेलन के दौरान पुतिन और मोदी की मुलाकात सामान्य बैठक कक्ष में नहीं, बल्कि पुतिन की शानदार बख्तरबंद ‘औरस’ लिमो में हुई। पुतिन ने प्रधानमंत्री मोदी का करीब 10 मिनट तक इंतजार किया। इसके बाद दोनों नेता लिमो में सवार हुए और निर्धारित स्थल तक पहुंचने में 15 मिनट का समय लिया। लेकिन असली कहानी यहां से शुरू होती है। दोनों नेताओं ने गाड़ी में ही करीब 45 मिनट और बिताए। बताया जाता है कि बातचीत इतनी अहम थी कि दोनों ने बीच में उसे रोकना उचित नहीं समझा। रूसी मीडिया के मुताबिक, यह कार अत्याधुनिक सुरक्षा सुविधाओं से लैस है और इसमें बिना रुकावट गोपनीय वार्ता संभव है। इसी वजह से पुतिन ने प्रधानमंत्री मोदी के साथ मुलाकात के लिए यही स्थान चुना।
अलास्का में ट्रंप संग पुतिन की बातचीत का जिक्र
पुतिन ने इस मुलाकात में मोदी को अपने और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच अलास्का में हुई बातचीत के बारे में बताया। हालांकि उन्होंने इस बातचीत की बारीकियों को सार्वजनिक नहीं किया, लेकिन उनके इस बयान से स्पष्ट है कि भारत और रूस के बीच न केवल रणनीतिक साझेदारी गहरी है, बल्कि उच्च स्तर पर सूचनाओं का आदान-प्रदान भी होता है कूटनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि पुतिन के इस कदम से यह संदेश जाता है कि रूस भारत को अपने सबसे भरोसेमंद साझेदारों में देखता है।
भारत-रूस रिश्तों का नया संकेत
यह मुलाकात भारत और रूस के बीच दशकों पुराने घनिष्ठ रिश्तों की याद दिलाती है। शीतयुद्ध के दौर से ही भारत और रूस (तब सोवियत संघ) के बीच मजबूत रणनीतिक, रक्षा और तकनीकी सहयोग रहा है। हाल के वर्षों में दोनों देशों ने ऊर्जा, रक्षा उत्पादन और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में भी साझेदारी को नए स्तर पर पहुंचाया है। पुतिन और मोदी के बीच इस तरह की ‘लिमो डिप्लोमेसी’ इस बात का संकेत है कि दोनों नेता व्यक्तिगत स्तर पर भी एक-दूसरे के साथ खुले तौर पर संवेदनशील मुद्दों पर चर्चा करने में सहज हैं।
एससीओ मंच पर भारत की भूमिका
भारत 2017 में एससीओ का पूर्णकालिक सदस्य बना। तब से वह संगठन के भीतर आतंकवाद विरोध, ऊर्जा सुरक्षा, डिजिटल कनेक्टिविटी और बहुपक्षीय सहयोग जैसे मुद्दों पर सक्रिय भूमिका निभा रहा है।
इस बार का शिखर सम्मेलन भी ऐसे समय में हुआ जब वैश्विक राजनीति में बड़े बदलाव हो रहे हैं – रूस-यूक्रेन युद्ध, अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता, और पश्चिमी देशों के साथ रूस के तनावपूर्ण रिश्ते। ऐसे में भारत की भूमिका एक ‘संतुलन साधक’ के रूप में देखी जाती है।
पुतिन ने खुद किया खुलासा
रूसी राष्ट्रपति ने खुद सार्वजनिक मंच पर यह बात कही कि उन्होंने मोदी को अलास्का वार्ता के बारे में बताया। पुतिन के इस बयान को कूटनीतिक हलकों में पारदर्शिता का संकेत भी माना जा रहा है, क्योंकि आमतौर पर ऐसे संवेदनशील मुद्दों को सार्वजनिक रूप से नहीं कहा जाता। यह भारत की बढ़ती वैश्विक साख और प्रधानमंत्री मोदी की व्यक्तिगत कूटनीति का भी प्रमाण माना जा रहा है।
क्यों मायने रखती है यह खबर
विशेषज्ञों का कहना है कि जब दुनिया के दो बड़े नेता किसी तीसरे देश के मुद्दों पर गोपनीय बातचीत करते हैं और उसे साझा करते हैं, तो यह भरोसे का स्तर दिखाता है। रूस और भारत के बीच ऐसे समय में निकटता बनी रहना, जब रूस पश्चिमी देशों के साथ टकराव में है, भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता को भी दर्शाता है।
तियानजिन में एससीओ शिखर सम्मेलन के दौरान पुतिन और मोदी की ‘औरस’ लिमो मुलाकात ने दुनिया को यह संदेश दिया कि भारत और रूस के रिश्ते अभी भी उतने ही घनिष्ठ हैं जितने पहले थे। पुतिन द्वारा अलास्का में ट्रंप संग हुई बातचीत का जिक्र करना दोनों देशों के बीच गहरे विश्वास का संकेत है। यह मुलाकात न केवल शिखर सम्मेलन की सुर्खी बनी बल्कि वैश्विक कूटनीति के लिए भी एक अहम घटना साबित हुई।