प्रयागराज : डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य की डिग्री मामले में सोमवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बार फिर याचिका खारिज कर दी। यह याचिका पूर्व भाजपा नेता और RTI कार्यकर्ता दिवाकर नाथ त्रिपाठी ने दायर की थी।
याचिका में कहा गया- केशव प्रसाद मौर्य ने फर्जी डिग्री लगाकर 5 अलग-अलग चुनाव लड़े। कौशांबी में फर्जी डिग्री के आधार पर ही इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन से पेट्रोल पंप हासिल किया। इसलिए उनके खिलाफ FIR दर्ज हो।
2 साल पहले दिवाकर की याचिका हाईकोर्ट ने निरस्त कर दी थी। कहा था- याचिका तथ्यहीन है। याचिका में लगाए गए आरोपों में बल नहीं है। इसके बाद दिवाकर नाथ त्रिपाठी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को निरस्त कर दिया था। कहा था- हाईकोर्ट में फिर से याचिका दाखिल की जाए।
इसके बाद दिवाकर ने हाईकोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल की, जिसे कोर्ट ने 24 अप्रैल 2025 को स्वीकार लिया। याचिकाकर्ता की तरफ से वकील रमेश चंद्र द्विवेदी और यूपी सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल ने और शासकीय अधिवक्ता एके संड ने बहस की।
सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल ने कहा था- याची ने अधीनस्थ अदालत में झूठा हलफनामा दाखिल किया है। जो आरोप लगाया गया है, उससे अपराध संज्ञेय नहीं है। फिर 23 मई 2025 को हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित कर लिया। आज 7 जुलाई को पुनर्विचार याचिका कोर्ट ने खारिज कर दिया। जस्टिस संजय कुमार सिंह की सिंगल बेंच ने फैसला सुनाया।\
RTI एक्टिविस्ट का दावा है कि डिप्टी सीएम ने साल 2014 में फूलपुर लोकसभा सीट से नामांकन के दौरान हलफनामे में अपनी डिग्री BA बताई। इसमें दिखाया गया कि उन्होंने हिंदी साहित्य सम्मेलन से साल 1997 में BA किया है। डिप्टी सीएम ने साल 2007 में प्रयागराज के पश्चिमी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा।
इस समय जो हलफनामा दिया गया, उसमें बताया गया कि उन्होंने हिंदी साहित्य सम्मेलन से 1986 में प्रथमा, 1988 में मध्यमा और 1998 में उत्तमा की थी। प्रथमा की डिग्री को कुछ राज्यों में हाईस्कूल, मध्यमा को इंटर और उत्तमा को ग्रेजुएट के समकक्ष मान्यता दी जाती है। हिंदी साहित्य सम्मेलन बीए की डिग्री नहीं देता। इसलिए हलफनामे में दी गई जानकारी गलत है।
अगर वह उत्तमा को ही BA की डिग्री बता रहे हैं तो दोनों के पास करने वाले साल अलग-अलग क्यों हैं? मतलब, 2007 के हलफनामे में उत्तीर्ण करने वाला साल 1998 लिखा है, जबकि साल 2012 और 2014 के चुनावी हलफनामों में यही 1997 लिखा गया है।
दिवाकर त्रिपाठी का कहना है कि मैंने स्थानीय थाना, एसएसपी से लेकर यूपी सरकार और केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों में प्रार्थना पत्र देकर कार्रवाई की मांग की, मगर कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसलिए मुझे कोर्ट जाना पड़ा।