माघ मेले में मौनी अमावस्या के दौरान स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के स्नान को रोकने का विवाद अब कानूनी रूप ले चुका है। प्रशासन ने अविमुक्तेश्वरानंद से उनके शंकराचार्य पद का प्रमाण मांगते हुए नोटिस जारी किया, जिसे उन्होंने असंवैधानिक और अधिकार क्षेत्र के बाहर बताया। उनका कहना है कि ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद ने उन्हें जीवनकाल में अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था।
इसी बीच, तुलसी पीठ के पीठाधीश्वर जगदगुरु रामभद्राचार्य ने भी इस विवाद पर अपनी राय दी। उन्होंने कहा कि कोई भी व्यक्ति या व्यवस्था यदि शास्त्रों के विरुद्ध कार्य करती है, तो उसे न सुख, न शांति और न ही सद्गति मिलती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अविमुक्तेश्वरानंद को रथ या पालकी में चढ़कर स्नान नहीं करना चाहिए था। रामभद्राचार्य ने इसे शास्त्रों के उल्लंघन के रूप में देखा और कहा कि बिना शंकराचार्य के स्नान के पूरा माघ मेला अधूरा है, जैसे यज्ञ में नारियल की आहुति के बिना यज्ञ पूर्ण नहीं होता।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अभी भी माघ मेला स्थल पर विरोध में बैठे हैं और अपने कैंप के बाहर टेंट लगाकर रह रहे हैं। उन्होंने नोटिस के खिलाफ चेतावनी दी है कि यदि 24 घंटे में नोटिस वापस नहीं लिया गया, तो वे कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट समेत अन्य कानूनी कार्रवाई करेंगे।
इस विवाद पर राजनीतिक हस्तक्षेप भी देखने को मिला है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने योगी सरकार पर सवाल उठाते हुए कहा कि प्रशासन द्वारा अविमुक्तेश्वरानंद से प्रमाणपत्र मांगना सही नहीं है। सपा ने स्पष्ट रूप से शंकराचार्य के समर्थन में अपनी राय रखी।
इस विवाद ने धार्मिक और प्रशासनिक दोनों ही पक्षों में गहरी बहस को जन्म दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि धार्मिक परंपराओं और शास्त्रों का सम्मान करते हुए ही माघ मेले जैसी सांस्कृतिक घटनाओं को सुचारू रूप से आयोजित किया जा सकता है।