जम्मू-कश्मीर की सियासत एक बार फिर सुर्खियों में है। हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के पूर्व अध्यक्ष अब्दुल गनी भट के निधन के बाद घाटी के बड़े नेताओं ने आरोप लगाया है कि उन्हें उनके जनाजे में शामिल होने तक की अनुमति नहीं दी गई। पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती, पीपुल्स कॉन्फ्रेंस अध्यक्ष सज्जाद लोन और हुर्रियत के पूर्व अध्यक्ष मीरवाइज उमर फारूक ने दावा किया कि उन्हें हाउस अरेस्ट (नजरबंद) किया गया। इस पूरे घटनाक्रम ने घाटी की राजनीति और प्रशासन की मंशा पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
अब्दुल गनी भट का निधन और नेताओं की नाराज़गी
90 वर्षीय अब्दुल गनी भट का लंबी बीमारी के बाद 17 सितंबर को सोपोर स्थित उनके आवास पर निधन हो गया था। कश्मीर की राजनीति में उनका नाम शांति और संवाद की आवाज़ के तौर पर लिया जाता था। ऐसे में उनका अंतिम संस्कार घाटी के लिए एक भावुक क्षण था। लेकिन महबूबा मुफ्ती, सज्जाद लोन और मीरवाइज उमर फारूक का आरोप है कि उन्हें उनके जनाजे में शामिल होने की इजाज़त नहीं दी गई।
महबूबा मुफ्ती का हमला: लोकतंत्र पर सवाल
पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने इस कदम को जम्मू-कश्मीर के लोकतंत्र पर हमला बताया। उन्होंने एक्स (ट्विटर) पर लिखा कि बीजेपी की कश्मीर में शांति या सुधार में कोई रुचि नहीं है। इसके बजाय, वे राजनीतिक लाभ के लिए यहां की पीड़ा और अशांति को हथियार बना रहे हैं। उन्होंने इस रवैये को गैर-जिम्मेदाराना और खतरनाक बताया। महबूबा का कहना है कि किसी नेता को श्रद्धांजलि देने से रोकना, न सिर्फ अमानवीय है बल्कि यह दिखाता है कि कश्मीर में लोकतंत्र किस हालत में है।
मीरवाइज उमर फारूक: दोस्ती और श्रद्धांजलि से वंचित
हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष मीरवाइज उमर फारूक ने भी दावा किया कि उन्हें बुधवार देर रात से ही नजरबंद कर दिया गया था। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, “मुझे शब्दों से परे दुख है कि अधिकारियों ने प्रो. भट के परिवार को जल्दबाजी में उनका जनाज़ा पूरा करने के लिए मजबूर किया। मुझे उनके अंतिम सफर में शामिल होने का अधिकार तक नहीं दिया गया।” मीरवाइज ने आगे कहा कि उनका और भट का रिश्ता 35 साल पुराना था। उन्होंने इसे “असहनीय क्रूरता” करार दिया कि उन्हें अपने मित्र और मार्गदर्शक को अंतिम विदाई देने का मौका नहीं मिला।
सज्जाद लोन की पीड़ा: “क्यों रोका गया?”
पूर्व मंत्री और पीपुल्स कॉन्फ्रेंस अध्यक्ष सज्जाद लोन ने भी यही आरोप दोहराया। उन्होंने कहा, “मुझे प्रोफेसर गनी साहब के पैतृक गाँव बोटिंगू जाने से रोकने के लिए नजरबंद कर दिया गया है। समझ नहीं आता कि इसकी क्या जरूरत थी। प्रोफेसर साहब एक शांतिवादी थे और बहुत पहले ही सक्रिय राजनीति से संन्यास ले चुके थे।” सज्जाद लोन ने कहा कि अंतिम विदाई एक बुनियादी हक है और इसे रोकना अस्वीकार्य है।
प्रशासन की चुप्पी और बढ़ते सवाल
तीनों नेताओं के दावों के बावजूद प्रशासन की ओर से अब तक कोई स्पष्ट स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। हालांकि सुरक्षा कारणों का हवाला देकर इस तरह की कार्रवाई पहले भी की जाती रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी दिवंगत नेता के अंतिम संस्कार में जाने से रोकना वाकई सुरक्षा का मामला है या राजनीतिक रणनीति?
घाटी में लोकतंत्र पर बहस
अब्दुल गनी भट के निधन पर श्रद्धांजलि देने से तीन बड़े नेताओं को रोकने की घटना ने घाटी में एक नई बहस छेड़ दी है। विपक्षी दलों का मानना है कि यह कदम लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की बुनियाद पर चोट है। वहीं, आम लोग इसे घाटी में बनी असुरक्षा और राजनीतिक अविश्वास की नई तस्वीर मान रहे हैं। यह सवाल अब और तेज़ हो गया है कि क्या कश्मीर में राजनीतिक नेताओं की आवाज़ अब भी सच्चे लोकतंत्र के दायरे में सुनी जा रही है या फिर उसे सीमित करने की कोशिश हो रही है?