नई दिल्ली के कूटनीतिक क्षेत्र चाणक्यपुरी ने सोमवार को एक ऐसा दृश्य देखा, जो आमतौर पर राजनयिक स्वागत से बिल्कुल अलग होता है। यह किसी शांत औपचारिक आगमन जैसा नहीं था, बल्कि एक भव्य शो की तरह था ऐसा लगा मानो किसी रॉक कॉन्सर्ट की शुरुआत हो रही हो। जब सर्जियो गोर ने भारत में अमेरिकी राजदूत के रूप में अपने पहले दिन अमेरिकी दूतावास परिसर में कदम रखा, तो माहौल में औपचारिकता नहीं, बल्कि ऊर्जा, शोर और प्रदर्शन की गूंज थी।
जैसे ही गोर दूतावास पहुंचे, चारों ओर रॉक एन रोल संगीत गूंजने लगा। गन्स एन’ रोज़ेज़, मेटालिका और आर.ई.एम. जैसे मशहूर बैंड्स के गानों की तेज़ धुनें लाल बलुआ पत्थर की इमारत से टकराकर लौट रही थीं। यह कोई हल्का-सा बैकग्राउंड म्यूज़िक नहीं था, बल्कि पूरी तरह सुनियोजित और ऊंची आवाज़ में बजाया गया संदेश था। दूतावास के कर्मचारियों के बीच चर्चा थी कि यह प्लेलिस्ट खुद सर्जियो गोर ने तैयार की थी एक ऐसे राजदूत द्वारा, जो खुद को पार्ट-टाइम डीजे और फुल-टाइम इमेज-बिल्डर मानते हैं।
औपचारिकता नहीं, मंचन
इस पूरे कार्यक्रम का अंदाज़ किसी राजनयिक कार्यक्रम से ज्यादा एक भव्य शो जैसा था। दूतावास के सामने लाल कालीन बिछाया गया था। सैन्य बैंड पूरी तैयारी के साथ खड़ा था, उनके वाद्य यंत्र जनवरी की धूप में चमक रहे थे। दोनों ओर खड़े दूतावास कर्मचारी किसी सरकारी स्वागत पंक्ति की तरह नहीं, बल्कि दर्शकों की तरह दिख रहे थे—मानो किसी बड़े कलाकार के मंच पर आने का इंतजार हो।
सबसे ज्यादा ध्यान खींचा उस लेक्टर्न ने, जो हूबहू अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले मंच जैसा था। इसके पीछे दो विशाल अमेरिकी झंडे लगे थे, जो कैमरों के लिए एकदम सटीक फ्रेम तैयार कर रहे थे। यह साफ था कि यह दृश्य केवल मौके पर मौजूद लोगों के लिए नहीं, बल्कि तस्वीरों और वीडियो के जरिए दूर तक संदेश पहुंचाने के लिए रचा गया था।
दोपहर ठीक 12 बजे दूतावास के गेट खुले। एक चमकती काली एसयूवी अंदर दाखिल हुई। जैसे ही सर्जियो गोर गाड़ी से बाहर निकले, उन्हें चार्ज डी अफेयर्स ने स्वागत किया और वहां मौजूद लोगों की जोरदार तालियों से माहौल गूंज उठा।
शब्दों से ज्यादा दृश्य
जब सर्जियो गोर ने बोलना शुरू किया, तो उनका अंदाज़ भी उसी दृश्य के अनुरूप था। यह कोई धीमा, संतुलित राजनयिक संबोधन नहीं था, बल्कि एक आत्मविश्वासी उद्घाटन भाषण था ऐसा भाषण, जिसे सुनने से ज्यादा देखने के लिए रचा गया था। उनका लहजा यह साफ संकेत दे रहा था कि उनके लिए ऑप्टिक्स, यानी दृश्य प्रभाव, शब्दों से कहीं ज्यादा मायने रखते हैं।
संदेश स्पष्ट था: अमेरिका चुपचाप नहीं आया है। यह एक ऐसी उपस्थिति थी जो खुद को महसूस कराना चाहती थी। गोर यह जताना चाहते थे कि कूटनीति अब केवल बंद कमरों और सावधानी से चुने गए शब्दों तक सीमित नहीं रहेगी। यह सार्वजनिक होगी, दिखाई देगी और असर छोड़ेगी।
परंपरा से हटकर शुरुआत
दिल्ली के अनुभवी पत्रकारों और कूटनीतिक मामलों पर नजर रखने वालों के लिए यह दृश्य चौंकाने वाला था। किसी को याद नहीं था कि किसी अमेरिकी राजदूत ने पहले ही दिन इतना बड़ा सार्वजनिक प्रदर्शन किया हो। परंपरागत रूप से, किसी राजदूत की पहली आधिकारिक गतिविधि राष्ट्रपति भवन जाकर राष्ट्रपति को परिचय पत्र सौंपना होती है। यह एक शांत और सख्त प्रोटोकॉल वाला कार्यक्रम होता है।
लेकिन सर्जियो गोर ने अभी तक यह औपचारिक प्रक्रिया पूरी नहीं की है। वह इस सप्ताह के अंत में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मिलने वाले हैं। इसके बावजूद, उन्होंने पहले ही दिन सार्वजनिक मंच पर खुद को स्थापित कर लिया और यह संकेत दे दिया कि वह इंतजार करने वालों में से नहीं हैं।
राजनीति की झलक
इस पूरे आयोजन में कई लोगों को अमेरिकी राजनीति की झलक दिखाई दी। संगीत, भीड़ का प्रबंधन, मंच की बनावट सब कुछ किसी चुनावी अभियान जैसा लग रहा था। यह शैली वॉशिंगटन के विदेश मंत्रालय की पारंपरिक गंभीरता से ज्यादा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की राजनीतिक शैली से मेल खाती दिखी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कोई संयोग नहीं था। जिस तरह ट्रम्प ने वर्षों पहले अपनी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत एक भव्य और चर्चा में रहने वाले अंदाज़ में की थी, उसी तरह सर्जियो गोर ने भी यह सुनिश्चित किया कि दिल्ली में उनका आगमन अनदेखा न रह जाए।
दिल्ली, जो संकेत पढ़ना जानती है
दिल्ली सत्ता और प्रतीकों की भाषा अच्छे से समझती है। यहां शाही परेडें देखी गई हैं, सैन्य शक्ति प्रदर्शन हुए हैं और बड़े-बड़े राजकीय दौरे आयोजित हुए हैं। लेकिन सर्जियो गोर का यह स्वागत अलग था। यह न तो पूरी तरह औपचारिक था, न ही पूरी तरह परंपरागत। यह ज्यादा ऊर्जावान, ज्यादा तेज़ और ज्यादा सीधा संदेश देने वाला था।
यह किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम जैसा भी नहीं था, बल्कि एक शक्ति प्रदर्शन जैसा था कम शब्दों में ज्यादा असर।
पहले दिन ही चर्चा के केंद्र में
अपने पहले ही दिन सर्जियो गोर ने वह कर दिखाया, जो बहुत कम राजदूत कर पाते हैं। उन्होंने लोगों को रुकने, देखने और बात करने पर मजबूर कर दिया। कागजी कामकाज शुरू होने से पहले, औपचारिक मुलाकातों से पहले और पारंपरिक कूटनीति के शांत दौर से पहले ही उन्होंने अपनी छाप छोड़ दी।
इस कार्यक्रम के जरिए गोर ने साफ कर दिया कि वह सिर्फ एक पारंपरिक राजदूत नहीं हैं। वह अपनी भूमिका को एक मंच की तरह देखते हैं जहां हर दृश्य, हर ध्वनि और हर संकेत मायने रखता है।
एक साफ संदेश
चाणक्यपुरी में उस दिन जो हुआ, उसका संदेश साफ था। अमेरिका भारत में अपनी मौजूदगी को न केवल मजबूत करना चाहता है, बल्कि उसे दिखाना भी चाहता है। यह आगमन किसी फुसफुसाहट की तरह नहीं था, बल्कि इलेक्ट्रिक गिटार की तेज़ धुन की तरह था जो सुनाई भी देती है और याद भी रहती है।
अब देखना यह होगा कि यह हाई-वॉल्यूम शुरुआत आगे की कूटनीति में कैसे बदलती है। लेकिन इतना तय है कि सर्जियो गोर ने अपने पहले ही दिन यह जता दिया है कि वह दिल्ली में चुपचाप काम करने नहीं आए हैं। उनकी कूटनीति में संदेश भी होगा, मंचन भी और आवाज़ भी पूरी।