भारत एक ऐसे महानायक को श्रद्धांजलि दे रहा है जिनकी असाधारण दूरदर्शिता और दृढ़ इच्छाशक्ति ने आधुनिक भारत के मानचित्र को आकार दिया। आज, लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की 75वीं पुण्यतिथि है। यह दिवस हमें उनके अविस्मरणीय योगदान, विशेष रूप से स्वतंत्रता के बाद 560 से अधिक रियासतों के एकीकरण के उनके महान कार्य को याद करने का अवसर देता है।
एकीकरण के शिल्पकार
सरदार पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नडियाद में हुआ था। वह एक सफल बैरिस्टर थे जिन्होंने अपनी प्रतिष्ठा और करियर को त्याग कर महात्मा गांधी के मार्गदर्शन में स्वतंत्रता संग्राम में प्रवेश किया। बारडोली सत्याग्रह (1928) में उनकी दृढ़ नेतृत्व क्षमता के कारण उन्हें वहाँ की महिलाओं द्वारा ‘सरदार’ की उपाधि दी गई, जो उनके नाम का स्थायी हिस्सा बन गई।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, सरदार पटेल ने देश के पहले उप प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के रूप में कार्यभार संभाला। लेकिन उनका सबसे बड़ा और सबसे चुनौतीपूर्ण मिशन था: भारत को एक राष्ट्र के रूप में संगठित करना।
जब भारत को आजादी मिली, तो यह सैकड़ों छोटी-बड़ी रियासतों में बंटा हुआ था। इनमें से कुछ रियासतों ने भारत या पाकिस्तान में शामिल होने, या स्वतंत्र रहने का विकल्प चुना था। इन रियासतों की संख्या 560 से अधिक थी, और अगर वे अलग रहतीं, तो भारत कई छोटे टुकड़ों में विभाजित हो जाता, जिससे देश की संप्रभुता और सुरक्षा को गंभीर खतरा पैदा होता।
सरदार पटेल ने इस ऐतिहासिक चुनौती का सामना करने के लिए ‘गाजर और छड़ी’ (carrot and stick) की नीति अपनाई। उन्होंने रियासतों के शासकों के साथ बातचीत, अनुनय और कूटनीति का उपयोग किया। उन्होंने उन्हें नए राष्ट्र में शामिल होने के दीर्घकालिक लाभों को समझाया। अधिकांश शासक ‘इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन’ (Instrument of Accession) नामक एक दस्तावेज पर हस्ताक्षर करके स्वेच्छा से भारत संघ में शामिल हो गए।
दृढ़ता और साहस की गाथा
हालांकि, कुछ रियासतें—विशेष रूप से जूनागढ़, हैदराबाद और जम्मू और कश्मीर—विलय के लिए तैयार नहीं थीं। यहीं पर सरदार पटेल का ‘लौह पुरुष’ वाला व्यक्तित्व सामने आया:
जूनागढ़: यह गुजरात के काठियावाड़ प्रायद्वीप में एक रियासत थी जिसका शासक पाकिस्तान में शामिल होना चाहता था, जबकि अधिकांश आबादी हिंदू थी और भारत में शामिल होना चाहती थी। सरदार पटेल ने जनमत संग्रह (plebiscite) का आयोजन किया, जिसके बाद जूनागढ़ को भारत का हिस्सा बना लिया गया।
हैदराबाद: यह सबसे बड़ी और सबसे जटिल रियासतों में से एक थी, जिसका शासक (निज़ाम) स्वतंत्र रहना चाहता था। निज़ाम ने ‘रज़ाकार’ नामक एक निजी सेना का गठन किया, जिसने विद्रोह और अत्याचार शुरू कर दिए। सरदार पटेल ने 1948 में ‘ऑपरेशन पोलो’ नामक सैन्य कार्रवाई का आदेश दिया। पुलिस कार्रवाई के बाद, हैदराबाद को भारतीय संघ में मिला लिया गया।
जम्मू और कश्मीर: यहां की समस्या अलग थी। पाकिस्तान के समर्थन से कबीलाई हमलावरों ने आक्रमण शुरू कर दिया। महाराजा हरि सिंह ने भारत से मदद मांगी और सरदार पटेल ने तुरंत मदद भेजी, लेकिन इससे पहले महाराजा ने भारत में विलय के दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए।
सरदार पटेल ने इन रियासतों के एकीकरण में जिस निर्णायक गति और दृढ़ता का प्रदर्शन किया, उसने भारत को एक मजबूत, अखंड राष्ट्र के रूप में खड़ा किया। उनकी इस उपलब्धि के बिना, आज के भारत की कल्पना करना भी असंभव था।
प्रशासनिक और आर्थिक योगदान
पटेल का योगदान केवल एकीकरण तक ही सीमित नहीं था। गृह मंत्री के रूप में, उन्होंने देश की प्रशासनिक मशीनरी को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने अखिल भारतीय सेवाओं (All India Services), विशेष रूप से भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS), की स्थापना में एक केंद्रीय भूमिका निभाई। उनका मानना था कि एक मजबूत और निष्पक्ष सिविल सेवा ही एक नए राष्ट्र की रीढ़ हो सकती है। आज भी, सिविल सेवक उन्हें ‘सिविल सेवकों के संरक्षक संत’ के रूप में याद करते हैं।
उन्होंने कई राष्ट्रीय महत्व के आर्थिक और कृषि सुधारों की भी वकालत की। पटेल भारतीय सहकारी आंदोलन के एक मजबूत समर्थक थे, जिसका उद्देश्य ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करना था।
विरासत और वर्तमान प्रासंगिकता
15 दिसंबर 1950 को सरदार पटेल का निधन हो गया। लेकिन उनकी विरासत आज भी जीवित है। उनकी दूरदर्शिता और राष्ट्र के प्रति उनकी अटूट भक्ति को सम्मानित करने के लिए, भारत सरकार ने उनकी जयंती (31 अक्टूबर) को ‘राष्ट्रीय एकता दिवस’ के रूप में घोषित किया है।
इसके अलावा, उनकी महानता के प्रतीक के रूप में, गुजरात में नर्मदा नदी के तट पर दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा, ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ का निर्माण किया गया है। यह प्रतिमा केवल एक स्मारक नहीं है, बल्कि यह भारतीयों को एकता, दृढ़ संकल्प और राष्ट्र निर्माण के लिए समर्पण के उनके संदेश की याद दिलाती है।
उनकी 75वीं पुण्यतिथि पर, राष्ट्र सरदार पटेल के सामने नतमस्तक है, जिन्होंने अपने असाधारण राजनीतिक कौशल और अटूट संकल्प से भारतीय संघ की नींव रखी। वह हमेशा भारतीय इतिहास के सबसे महान राष्ट्र निर्माताओं में से एक बने रहेंगे।