ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक तेल बाजार में भूचाल ला दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान से “बिना शर्त आत्मसमर्पण” की मांग कर दी, जिसके बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं।
तेल की कीमतों में ऐतिहासिक उछाल
अमेरिकी कच्चे तेल का मानक WTI फ्यूचर्स 12.2% की जोरदार बढ़त के साथ 90.90 डॉलर प्रति बैरल यानी करीब ₹7,575 प्रति बैरल पर पहुंच गया। विशेषज्ञों के अनुसार यह अप्रैल 2020 के बाद किसी एक सप्ताह में तेल की सबसे बड़ी साप्ताहिक बढ़त है। यह उछाल उस समय आया जब पश्चिम एशिया में तनाव लगातार गहराता जा रहा है और दुनिया भर के बाजारों में घबराहट का माहौल है।
होर्मुज जलडमरूमध्य बना सबसे बड़ी चिंता
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि इस समय सबसे बड़ा खतरा होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले तेल मार्ग पर मंडरा रहा है। SAMCO सिक्योरिटीज के बाजार विश्लेषण प्रमुख अपूर्व शेठ के अनुसार इस युद्ध ने ऊर्जा बाजारों को बुरी तरह हिलाकर रख दिया है। उन्होंने बताया कि दुनिया के कुल तेल आपूर्ति का लगभग 20% हिस्सा इसी होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। यदि यह मार्ग किसी कारण से बाधित हो गया तो वैश्विक ऊर्जा संकट की स्थिति पैदा हो सकती है।
इतिहास का सबसे बड़ा तेल संकट बनने का खतरा
S&P ग्लोबल एनर्जी के कच्चे तेल अनुसंधान प्रमुख जिम बर्कहार्ड ने चेताया है कि अमेरिका और इजरायल एक तरफ और ईरान दूसरी तरफ इस टकराव से तेल बाजार के इतिहास का सबसे बड़ा आपूर्ति संकट खड़ा हो सकता है। उनके अनुसार इस संघर्ष का असर पहले से ही क्षेत्र के ऊर्जा ढांचे पर पड़ने लगा है।
भारत पर क्या पड़ेगा असर?
भारत एक बड़ा तेल आयातक देश है और इस संकट का सीधा असर यहां की आम जनता की जेब पर पड़ सकता है। यदि कच्चे तेल की कीमतें इसी तरह ऊंची बनी रहीं तो पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतें बढ़ सकती हैं। विश्लेषकों का कहना है कि पश्चिम एशिया में यह तनाव जितना लंबा खिंचेगा, भारत सहित तमाम तेल आयातक देशों की अर्थव्यवस्था पर उतना ही अधिक दबाव पड़ेगा।