कोलोराडो विश्वविद्यालय में भारतीय छात्रों ने सांस्कृतिक भेदभाव के खिलाफ जीती बड़ी कानूनी लड़ाई, 1.8 करोड़ रुपए का समझौता

Vin News Network
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कोलोराडो विश्वविद्यालय में भारतीय छात्रों ने सांस्कृतिक भेदभाव के खिलाफ $200,000 का मुकदमा जीतकर मास्टर्स डिग्री प्राप्त की।

संयुक्त राज्य अमेरिका के कोलोराडो विश्वविद्यालय, बोल्डर में अध्ययनरत दो भारतीय पीएचडी छात्रों ने सांस्कृतिक भेदभाव के खिलाफ अपने अधिकारों की लड़ाई जीतते हुए $200,000 (करीब 1.8 करोड़ रुपए) की सिविल राइट्स सेटलमेंट हासिल किया। इस मामले की पृष्ठभूमि 2023 में हुए एक विवाद से जुड़ी है, जब अदित्य प्रकाश, 34 वर्ष, जो विश्वविद्यालय के मानवशास्त्र विभाग में पीएचडी कर रहे थे, अपने लंच में पालक पनीर को माइक्रोवेव में गरम कर रहे थे।

प्रकाश के अनुसार, उस दिन एक महिला स्टाफ सदस्य उनके पास आई और उन्हें खाने की “गंध” के कारण माइक्रोवेव का उपयोग न करने के लिए कहा। प्रकाश ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “उन्होंने कहा कि गंध तेज है। मैंने तर्क किया कि यह एक साझा स्थान है और मुझे इसका उपयोग करने का अधिकार है। मेरा भोजन मेरे लिए गर्व की बात है, और यह तय करना कि क्या अच्छा है या बुरा, सांस्कृतिक दृष्टिकोण पर निर्भर करता है।”

स्टाफ सदस्य ने यह भी दावा किया कि यहां ब्रोकली जैसी सब्जियों को भी गरम नहीं किया जा सकता क्योंकि उनकी गंध भी तेज होती है। प्रकाश ने इसका जवाब देते हुए कहा, “प्रसंग महत्वपूर्ण है। कितने लोग जानते हैं जो ब्रोकली खाने के कारण नस्लवाद का सामना करते हैं?”

इस विवाद के बाद प्रकाश की साथी, उर्मी भट्टाचार्य, 35 वर्ष, ने उनका समर्थन किया। दोनों का कहना था कि उन्हें इस घटना के कारण विश्वविद्यालय में भेदभाव और प्रतिकूल माहौल का सामना करना पड़ा। प्रकाश ने आरोप लगाया कि उन्हें बार-बार वरिष्ठ फैकल्टी के सामने बुलाया गया और आरोप लगाए गए कि उन्होंने स्टाफ सदस्य को “असुरक्षित महसूस कराया।”

भट्टाचार्य ने बताया कि उन्हें अपने शिक्षण सहायक के पद से बिना किसी स्पष्ट कारण के हटा दिया गया क्योंकि उन्होंने प्रकाश का समर्थन किया। “विभाग ने हमें पीएचडी के दौरान मिलने वाले मास्टर्स डिग्री भी नहीं दी। यही वह समय था जब हमने कानूनी रास्ता अपनाने का निर्णय लिया,” उन्होंने कहा।

इसके बाद दोनों ने अमेरिका के कोलोराडो जिला न्यायालय में विश्वविद्यालय के खिलाफ मुकदमा दायर किया। उनके वकीलों ने तर्क दिया कि खाने के विवाद के बाद विश्वविद्यालय ने उनके मास्टर्स डिग्री को रोक दिया, जो उन्हें पीएचडी के मार्ग में मिलनी थी। इसके अलावा, उनका कहना था कि विश्वविद्यालय में उन्हें ऐसा शत्रुतापूर्ण वातावरण झेलना पड़ा जिसने उनके शैक्षणिक प्रगति को प्रभावित किया।

मुकदमे में दावा किया गया कि उनके खाने और सांस्कृतिक प्राथमिकताओं के प्रति विश्वविद्यालय की प्रतिक्रिया, अंतरराष्ट्रीय छात्रों के खिलाफ “सिस्टमेटिक भेदभाव” का संकेत थी। यह मामला न केवल व्यक्तिगत अनुभव का मुद्दा था, बल्कि अमेरिकी शैक्षणिक संस्थानों में अंतरराष्ट्रीय छात्रों के अधिकारों और सम्मान के व्यापक मुद्दे को भी उजागर करता है।

सितंबर 2025 में कोलोराडो विश्वविद्यालय ने दोनों छात्रों को $200,000 का समझौता राशि अदा की और उनके मास्टर्स डिग्री भी प्रदान की। हालांकि, विश्वविद्यालय ने भविष्य में दोनों छात्रों को दाखिला लेने या यहां रोजगार करने से रोक दिया।

भट्टाचार्य ने हाल ही में अपने इंस्टाग्राम प्रोफाइल पर इस जीत की जानकारी साझा की। उन्होंने लिखा, “इस साल मैंने एक लड़ाई लड़ी – एक लड़ाई यह सुनिश्चित करने की कि मैं जो चाहूं वह खा सकूं और स्वतंत्र रूप से अपनी राय व्यक्त कर सकूं… चाहे मेरी त्वचा का रंग, मेरी जातीय पहचान या भारतीय उच्चारण कुछ भी हो।”

प्रकाश और भट्टाचार्य की यह कहानी केवल उनके व्यक्तिगत संघर्ष का नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय छात्रों के अधिकारों और सांस्कृतिक विविधता के सम्मान की दिशा में एक महत्वपूर्ण संदेश भी है। प्रकाश ने कहा, “मेरा भोजन मेरी शान है। विश्वविद्यालय में जिस तरह से हमारे साथ व्यवहार किया गया, वह न केवल असंवेदनशील था, बल्कि सांस्कृतिक असहिष्णुता का स्पष्ट उदाहरण था।”

भट्टाचार्य ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि उन्हें स्वास्थ्य संबंधी गंभीर परेशानियों का सामना करना पड़ा और उनका आत्म-सम्मान लगातार क्षतिग्रस्त हुआ। उन्होंने कहा, “मैं किसी अन्याय के सामने झुकने वाली नहीं हूं। मैं जानबूझकर उत्पीड़न के सामने चुप नहीं रहूंगी।”

मुकदमे की सफलता के बाद दोनों ने यह भी संदेश दिया कि छात्र अपने अधिकारों के लिए खड़े हो सकते हैं और शिक्षा संस्थानों में सांस्कृतिक विविधता और अंतरराष्ट्रीय छात्रों के अधिकारों का सम्मान होना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह मामला भविष्य में अन्य छात्रों के लिए एक मिसाल बनेगा।

इस घटना ने यह भी रेखांकित किया कि शिक्षा संस्थानों में अंतरराष्ट्रीय छात्रों के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण और समान अवसर प्रदान करना कितना महत्वपूर्ण है। इस मुकदमे की जीत ने यह स्पष्ट किया कि छात्रों के अधिकारों की रक्षा करना, चाहे वह सांस्कृतिक या शैक्षणिक हो, अमेरिका जैसे विकसित शिक्षा प्रणाली वाले देशों में भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है, लेकिन न्याय प्राप्त करना संभव है।

प्रकाश और भट्टाचार्य की कहानी अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए आत्मविश्वास और न्याय की प्रेरणा बनी है। उनके संघर्ष और जीत ने यह साबित किया कि सही समय पर कानूनी कार्रवाई करने और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहने से न्याय प्राप्त किया जा सकता है।

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