भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच पिछले कई वर्षों से लंबित व्यापार मुद्दों पर आखिरकार तेजी से समाधान निकलता दिख रहा है। मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी. अनंत नागेश्वरन ने हाल ही में कहा कि दोनों देशों के बीच अधिकांश विवादित मामलों पर सहमति बन चुकी है। उनके अनुसार, एक व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौता अब मार्च तक अंतिम रूप ले सकता है। यह बयान भारत-अमेरिका आर्थिक संबंधों के भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, खासतौर पर ऐसे समय में जब वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता बनी हुई है।
नागेश्वरन ने इस दौरान भारत की आर्थिक स्थिति पर भी भरोसा जताया। उन्होंने कहा कि वित्त वर्ष 2027 (FY27) तक भारत की आर्थिक वृद्धि का आधार मजबूत दिखाई दे रहा है। उनका मानना है कि भारत की अर्थव्यवस्था निवेश, सेवाओं के निर्यात और स्थिर आर्थिक नीतियों पर आधारित होकर आगे बढ़ेगी। उन्होंने रुपये के मूल्य पर भी टिप्पणी की और कहा कि भारतीय रुपया वर्तमान परिस्थितियों में “अपनी बुनियादी आर्थिक शक्तियों की तुलना में कम मूल्यांकित” यानी undervalued है। यह संकेत देता है कि आर्थिक सुधारों और स्थिरता के साथ भविष्य में रुपये के मजबूत होने की संभावना बनी हुई है।
दूसरी ओर, वॉशिंगटन से भी सकारात्मक संकेत सामने आ रहे हैं। अमेरिकी प्रशासन ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि भारत ने हाल के महीनों में जो व्यापार प्रस्ताव भेजे हैं, वे अब तक मिले सबसे प्रभावी और आगे बढ़कर दिए गए प्रस्तावों में शामिल हैं। यह विदेश व्यापार मंत्रालय के लिए एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। अमेरिका की ओर से यह पहली बार है कि इतनी स्पष्ट और सकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिली है। इससे दोनों देशों के बीच लंबे समय से चली आ रही व्यापार वार्ताओं को एक नई गति मिलती दिख रही है।
PTI की एक रिपोर्ट में बताया गया कि US Trade Representative (USTR) के वरिष्ठ अधिकारी जेमिसन ग्रीयर ने अमेरिकी सीनेट की एक एप्रोप्रिएशंस सबकमेटी में कहा कि भारत की ताज़ा व्यापार पेशकशें “अब तक मिली पेशकशों में से सबसे अच्छी” हैं। यह एक बड़ा बयान है, क्योंकि पिछले वर्षों में दोनों देशों के बीच टैरिफ, कृषि उत्पाद, IT सेवाओं, मेडिकल उपकरणों और डिजिटल व्यापार जैसे कई मुद्दों पर लगातार मतभेद बने रहे हैं। ग्रीयर के अनुसार, भारत के प्रस्तावों में लचीलापन और आधुनिक वैश्विक नियमों के प्रति झुकाव देखा गया है, जिससे दोनों पक्षों के बीच समझौते का रास्ता काफी खुल गया है।
हालांकि, इन सकारात्मक प्रगतियों के बीच कुछ जटिल मुद्दे अब भी बाकी हैं। अमेरिका की ओर से विशेष रूप से अमेरिकी कृषि उत्पादों, खासकर
- कॉर्न (मक्का)
- सोयाबीन
- और कुछ मांस उत्पादों
को लेकर अभी चर्चा जारी है। अमेरिका चाहता है कि भारत इन उत्पादों के लिए अपनी बाज़ार पहुंच को आसान करे, लेकिन भारत अपने किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए इस पर सावधानी से आगे बढ़ना चाहता है। यह मुद्दा भारत के घरेलू कृषि ढांचे और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से गहराई से जुड़ा है, इसलिए इसे हल करने में अधिक बातचीत की आवश्यकता है।
इन छोटे-मोटे मतभेदों के बावजूद, यह साफ है कि दोनों देश एक बड़े समझौते के लिए गंभीरता से आगे बढ़ रहे हैं। पिछले एक दशक में भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक सहयोग में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिले। कई बार व्यापार युद्ध जैसी स्थिति भी बनी, जब दोनों देशों ने एक-दूसरे के उत्पादों पर आयात शुल्क बढ़ा दिए थे। लेकिन हालिया महीनों में बढ़ती कूटनीतिक बातचीत, तकनीकी सहयोग और रक्षा साझेदारी ने दोनों देशों को फिर से नजदीक ला दिया है।
भारत और अमेरिका दोनों ही वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में अपने-अपने रणनीतिक साझेदारों को मजबूत करना चाहते हैं। चीन के बढ़ते आर्थिक और सामरिक प्रभाव को देखते हुए भारत और अमेरिका एक-दूसरे को स्वाभाविक सहयोगी के रूप में बेहतर विकल्प मानते हैं। ऐसे में एक मजबूत भारत–अमेरिका व्यापार समझौता न केवल आर्थिक रूप से, बल्कि भू-राजनीतिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण होगा।
यदि मार्च तक यह समझौता सामने आ जाता है, तो इससे न सिर्फ दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ेगा, बल्कि निवेश, टेक्नोलॉजी साझेदारी, डिजिटल नीति, ऊर्जा सुरक्षा और आपूर्ति श्रृंखला में भी नई संभावनाएं पैदा होंगी। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह समझौता आने वाले वर्षों में भारत को वैश्विक व्यापार ढांचे में और भी मजबूत स्थिति में ला सकता है।
भारत और अमेरिका दोनों ही एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जहां पारस्परिक समझ और सहयोग से बड़ा बदलाव संभव है। यदि यह व्यापार समझौता तय समय पर पूरा हो जाता है, तो यह दोनों देशों के लिए एक गेम-चेंजर साबित हो सकता है।