जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य के खिलाफ सोशल मीडिया पर फैल रही आपत्तिजनक सामग्री को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने फेसबुक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम और गूगल को नोटिस जारी करते हुए निर्देश दिया है कि ऐसे सभी पोस्ट और वीडियो, जो स्वामी रामभद्राचार्य की छवि को नुकसान पहुंचाते हैं या उनकी दिव्यांगता का मज़ाक उड़ाते हैं उन्हें सात दिनों के भीतर प्लेटफॉर्म से हटा दिया जाए।
क्या है पूरा मामला?
यह निर्देश शरद चंद्र श्रीवास्तव और अन्य याचिकाकर्ताओं की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया। याचिका में सोशल मीडिया पर बढ़ रही अशोभनीय और मानहानि करने वाली पोस्ट को लेकर चिंता जताई गई थी खासकर उन वीडियो को लेकर जिनमें स्वामी जी की नेत्रहीनता पर व्यंग्य किया गया था।
कोर्ट ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति संगीता चंद्रा और बृजराज सिंह की खंडपीठ ने स्पष्ट आदेश में कहा कि यह सामग्री न सिर्फ व्यक्तिगत गरिमा के खिलाफ है बल्कि दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों का भी उल्लंघन करती है। कोर्ट ने सोशल मीडिया कंपनियों को तत्काल प्रभाव से सामग्री हटाने को कहा और साथ ही राज्य दिव्यांग आयुक्त को निर्देश दिया कि गोरखपुर निवासी यूट्यूबर शशांक शेखर से जवाब मांगा जाए और उनके खिलाफ उचित कानूनी कार्रवाई की जाए।
सामाजिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि
गौरतलब है कि हाल ही में स्वामी रामभद्राचार्य ने मेरठ में रामकथा के दौरान पश्चिमी उत्तर प्रदेश को ‘मिनी पाकिस्तान’ कहा था जिसके बाद सोशल मीडिया पर उनकी काफी आलोचना हुई थी। समाजवादी पार्टी और भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर आज़ाद ने इस बयान को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी थी। उसी के बाद सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ कई आपत्तिजनक वीडियो तेजी से फैलने लगे। कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 8 अक्टूबर 2025 की तारीख तय की है। तब तक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को कार्रवाई की रिपोर्ट पेश करनी होगी। यह मामला न सिर्फ ऑनलाइन कंटेंट मॉडरेशन की गंभीरता को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि कोर्ट अब सोशल मीडिया की ज़िम्मेदारी तय करने की दिशा में सख्त होता जा रहा है, खासकर जब बात किसी दिव्यांग या धार्मिक नेता की गरिमा की रक्षा की हो।